बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in context| २४६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [पञ्चमहायज्ञाः |
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अनु०—देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, और ब्रह्मयज्ञ—ये पाँच महायज्ञ हैं और इन्हें ही महासत्र भी कहा गया है ॥ १ ॥
फलत एषां यज्ञानां महत्त्वं न स्वरूपतः, दीर्घकालप्रयोगसामान्याच्च महासत्रसमास्ते। 'देवयज्ञः' इत्यादिसंज्ञाकरणं संव्यवहारार्थम् ॥ १ ॥
अहरहस्स्वाहाकुर्यादा काष्ठात् तथैतं देवयज्ञं समाप्नोति ॥ २ ॥
अनु०—प्रतिदिन देवताओं के लिए 'स्वाहा' के साथ अग्नि में हवन करे। केवल एक काष्ठ का टुकड़ा तक भी हवन के रूप में अर्पित किया जा सकता है। इस प्रकार देवयज्ञ का अनुष्ठान करे ॥ २ ॥
अत्र 'देवेभ्यस्स्वाहा' इति मन्त्र उद्धर्त्तव्यः। द्रव्यमोदनप्रभृति आ काष्ठात् ज्ञेयम्। वीप्सावचनं नित्यत्वख्यापनार्थम्। समाप्नोति अनुतिष्ठेत्। एवमुत्तरेष्वपि यथासम्भवं योजना ॥ २ ॥
अहरहस्स्वधाकुर्यादोदपात्रात्तथैतं पितृयज्ञं समाप्नोति ॥ ३ ॥
अनु०—प्रतिदिन पितरों के लिए 'स्वधा' के साथ जल से पूर्ण पात्र इत्यादि पूजा अर्पित करे। इस प्रकार पितृयज्ञ का अनुष्ठान करे ॥ ३ ॥
'पितृभ्यस्स्वधा नमः' इति मन्त्रोऽध्याहार्यः। उदपात्रं उदकं आज्यौदनप्रभृति तत्पर्यन्तमित्यर्थः ॥ ३ ॥
अहरहर्नमस्कुर्यादा पुष्पेभ्यस्तथैतं भूतयज्ञं समाप्नोति ॥ ४ ॥
अनु०—प्रतिदिन प्राणियों के प्रति पुष्पों द्वारा पूजा आदि करते हुए आदर व्यक्त करे। इस प्रकार भूतयज्ञ का अनुष्ठान करे ॥ ४ ॥
'भूतेभ्यो नमः।' इति मन्त्रोद्धारः। एते त्रयो महायज्ञाः वैश्वदेवबलिहरणैरेव सम्पादिता इति। केचित्कर्तव्या इति। एतत्तु युक्तायुक्ततया विचारणीयम् ॥ ४ ॥
अहरहर्ब्राह्मणेभ्योऽन्नं दद्यादा मूलफलशाकेभ्यस्तथैतं मनुष्युयज्ञं समाप्नोति ॥ ५ ॥
अनु०—प्रतिदिन ब्राह्मणों के लिए मूल, फल, शाक आदि अन्न प्रदान करे और इस प्रकार मनुष्ययज्ञ का अनुष्ठान करे ॥ ५ ॥
बहुभ्यो दातुं शक्त्यभावे एकस्मा अपि ॥ ५ ॥
अहरहस्स्वाध्यायं कुर्यादा प्रणवात्तथैतं ब्रह्मयज्ञं समाप्नोति ॥ ६ ॥