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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

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कर धर्म के मार्ग पर प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते हैं और शारीरिक यातना भी इसी मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि को तैयार करती है। तप, उपवास, जप और होम धर्म में पुनः आस्था उत्पन्न करने के लिए विहित किये गये हैं। धर्मसूत्रों में एक बात स्पष्ट है, यह यह कि सभी प्रकार के प्रायश्चित्त का लक्ष्य परलोक भी है। धर्मसूत्र लोक के साथ-साथ परलोक से भी अधिक भीत है। यह परलोकभीरुता मनुष्य के आचरण को सही दिशा की ओर प्रेरित करने में आज तक सक्षम बनी हुई है।

कर्म का सिद्धान्त वस्तुतः आचार को गौरव प्रदान करता है। सदाचार से इस लोक में प्रतिष्ठा एवं मृत्यु के बाद भी उत्तम लोक की प्राप्ति होने की घोषणा धर्मसूत्र में बार-बार की गयी है। इसके विपरीत आचारहीन व्यक्ति अपने कर्मफल के कारण यहाँ और परलोक में भी विनष्ट होता है। प्रायश्चित्तों का विधान करते समय धर्मसूत्रों ने स्पष्ट रूप से कर्मफल के ऊपर विचार किया है। कर्मसिद्धान्त मनुष्य को सदैव उत्तम कर्म की प्रेरणा देता है। जीवन के अन्तिम दिनों में भी मनुष्य उत्तम कर्मों का आचरण कर दुष्कर्मों के बुरे परिणामों से बच सकता है और धर्मसूत्र भी प्रायश्चित्तों का विधान कर सदाचार की निरन्तर प्रेरणा देते रहते हैं। कर्म के इस सिद्धान्त की विशेषता का उल्लेख डा० राधाकृष्णन् ने इन शब्दों में किया है—

"The law of Karma encourages the sinner that it is never too late to mend. It does not shut the gates of hope against despair and suffering, guilt and peril." —The Hindu View of Life, p. 76.

बौधायनधर्मसूत्र

बौधायनधर्मसूत्र का सम्बन्ध कृष्णयजुर्वेद से है। जिस प्रकार आपस्तम्ब शाखा के सम्पूर्ण कल्प-साहित्य उपलब्ध है, उसी प्रकार बौधायन के भी सभी प्रकार के सूत्र होने के संकेत मिलते हैं। आपस्तम्ब और हिरण्यकेशी शाखाओं के समान बौधायन का सम्पूर्ण साहित्य इस समय सुरक्षित नहीं है। डॉ० बर्नल ने बौधायन के सूत्रों का संकलन किया है। उनके अनुसार श्रौतसूत्र १९ प्रश्नों में, कर्मान्तसूत्र २० अध्यायों में, द्वैधसूत्र ४ प्रश्नों में, गृह्यसूत्र ४ प्रश्नों में, धर्मसूत्र ४ प्रश्नों में तथा शुल्बसूत्र ३ अध्यायों में है। गृह्यसूत्र के पश्चिम भारतीय संस्करण में ४ के स्थान पर ९ प्रश्न मिलते हैं। बौधायन के श्रौत, कर्मान्त और द्वैधसूत्रों पर भवस्वामी की 'कल्पविवरण' नाम की व्याख्या है। बौधायन के ६ प्रकार के सूत्रों में पारस्परिक क्रम का निर्धारण करना कठिन है। सामान्यतः डॉ० बर्नल द्वारा प्रस्तुत क्रम ही प्रामाणिक माना जाता है। आपस्तम्ब के समान बौधायन के कल्पसूत्रों में भी धर्मसूत्रों का स्थान गृह्यसूत्र के बाद माना जा सकता है। धर्मसूत्र मूलतः कितने प्रश्नों में था इस विषय में विवाद है जिस पर आगे विस्तृत विचार किया जायगा।

बौधायन धर्मसूत्र के रचयिता के विषय में यह उल्लेखनीय है कि स्वयं इस धर्मसूत्र में ही बौधायन के नाम का कई स्थानों पर उल्लेख है और २,५,२७ में ऋषितर्पण के सन्दर्भ में कण्व बौधायन का नाम भी आया है। इससे यह स्पष्ट है कि बौधायन धर्मसूत्र की रचना के पहले कण्व बौधायन नाम के आचार्य हो चुके थे, जो पर्याप्त