बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in context१७८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ प्रायश्चित्तम् ]
^१त्र्यहं प्रातस्तथा सायं त्र्यहमन्यदयाचितम् ।
त्र्यहं परं तु नाऽश्नीयात् पराक इति कृच्छ्रः ॥ २५ ॥
**अनु०—**तीन दिन केवल प्रातः काल भोजन करने, अगले तीन दिन केवल सायंकाल भोजन करने, उसके बाद तीन दिन बिना माँगे मिले हुए भोजन पर निर्वाह करने और फिर तीन दिन भोजन न करने पर कृच्छ्र व्रत होता है ॥ २५ ॥
अयमपि द्वादशाह एव ॥ २५ ॥
अथ बालकृच्छ्रमाह—
प्रातस्सायमयाचितं पराक इति त्र्यूश्चतूरात्राः स एषः स्त्रीबालवृद्धानां कृच्छ्रः ॥ २६ ॥
**अनु०—**यदि प्रातः भोजन, सायंभोजन, अयाचित अन्न का भोजन तथा उपवास करते हुए चार-चार दिनों के तीन भागों में बारह दिनों का समय विभक्त किया जाय तो वह स्त्रियों, बालकों और वृद्धों का कृच्छ्र व्रत होता है ॥ २६ ॥
एकैकमेकाहः परं तु नाऽश्नीयात् अतश्चतुरहोऽयम् । बालादिग्रहणमशक्तोपलक्षणम् ॥ २६ ॥
^२यावत्सकृदाददीत तावदश्नीयात्पूर्ववत्सोऽतिकृच्छ्रः ॥ २७ ॥
**अनु०—**एक बार में जितना अन्न खा सकता हो उतना मात्र ही खाते हुए उपर्युक्त विधि से व्रत करे तो वह अतिकृच्छ्र नाम का व्रत होता है ॥ २७ ॥
पूर्ववदित्येतेन सर्वातिदेशे प्राप्ते ग्रासनियमार्थं सकृद्ग्रहणम् । ग्रासस्तु ^३शिख्यण्डपरिमितो पाणिपूरणान्नो वा ॥ २७ ॥
^४अब्भक्षस्तृतीयः स कृच्छ्रातिकृच्छ्रः ॥ २८ ॥
**अनु०—**यदि केवल जल पीकर ( बारह दिन का ) व्रत करे तो वह तीसरा व्रत कृच्छ्रातिकृच्छ्र नाम का व्रत होता है ॥ २८ ॥
कृत्स्नोऽपि द्वादशाहोऽब्भक्षो भवेत् । तृतीयग्रहणं समुच्चितानामेषां सर्वप्रायश्चित्तत्वप्रदर्शनार्थम् । यथाऽयं तृतीयो भवति तथा कुर्यादित्यर्थः । यद्वा—
१. See. आप. ध. १. २७. ७. and गो. ध. २६. ४.
२. cf. गौ. ध. २७. १८.
३. See. या. स्मृ. ३. २१९. शिख्यण्डो मयूराण्डः ।
४. cf. गौ. ध २७. १९. and See also. या. स्मृ. ३. ३२०