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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

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DevanagariHindipublished486 pages

Page 19 of 486

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Page 19

'त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एवेति द्वितीयो ब्रह्मचार्याकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुले अवसादयन् । सर्व एते पुण्यश्लोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ।'

धर्म को जिस रूप में धर्मशास्त्र धर्मसूत्र और स्मृतियों में विवेचित किया गया है उसके अन्तर्गत चार विषयों से संवद्ध नियमों को सम्मिलित किया गया है—१. वर्णधर्म अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के कर्त्तव्य, स्वधर्म एवम् आपद्धर्म २. आश्रमधर्म—चारों आश्रमों के विशिष्ट कर्त्तव्य एवम् वृत्तियाँ ३. नैमित्तिकधर्म—प्रायश्चित्त आदि ४. गुणधर्म—राजा के कर्त्तव्य, अपराध और दण्ड ।

धर्म की कुछ परिभाषाएँ प्रचलित हैं, जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित है—
'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म:'—अर्थात् वेद में बताये गये कर्म की प्रेरणा देने वाले विधि-नियम धर्म है ।—जैमिनि, पूर्वमीमांसासूत्र, १-१-२

वैशेषिकसूत्र में धर्म उसे माना गया है, जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस् प्राप्त होता है ।
'यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ।'
'श्रुतिप्रमाणको धर्म:'—हारीत, कुल्लूक, मनु० २-१ की टीका ।
'श्रुतिस्मृतिविहितो धर्म:'—श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण धर्म है ।—वसिष्ठधर्मसूत्र १-४-६ । इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि भारतीय धर्म का मूल वेद और स्मृति हैं। इनको प्रमाण मानकर विहित नियम या आचार ही धर्म है ।

धर्म के स्रोत

धर्म के स्रोतों का उल्लेख नियमपूर्वक प्रत्येक धर्मसूत्र और स्मृति में किया गया है । गौतमधर्मसूत्र में यह स्पष्टतः कहा गया है कि वेद धर्म का मूल है। 'वेदो धर्ममूलम् । तद्विदां च स्मृतिशीले ।' आपस्तम्बधर्मसूत्र—'धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदाश्च' १-१-१-२ । धर्म को जाननेवाले वेद का मर्म समझने वाले व्यक्तियों का मत ही वेद का प्रमाण है । इसी प्रकार वशिष्ठधर्मसूत्र में भी, जिसकी धर्म की परिभाषा का ऊपर उल्लेख किया गया है, श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण-नियमों को धर्म माना गया है, तथा उसके अभाव में शिष्टजनों के आचार को प्रमाण माना गया है ।

"श्रुतिस्मृतिविहितो धर्मः। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम् । शिष्टः पुनरकामात्मा ।"

बौधायनधर्मसूत्र में भी तीन प्रकार के धर्म का उल्लेख कर वेद, स्मृति और शिष्ट के आचरण को धर्म का स्रोत बताया गया है । 'उपदिष्टो धर्मः प्रतिवेदम् । स्मार्त्तो द्वितीयः । तृतीयः शिष्टागमः ।'

इसी प्रकार मनुस्मृति में वेद, स्मृति, वेदज्ञों के आचरण के अलावा आत्मा की तुष्टि को भी धर्म का मूल कहा गया है—

'वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥' २.६

'याज्ञवल्क्यस्मृति' में उपर्युक्त के साथ-साथ उचित संकल्प से उत्पन्न अभिलाषा या इच्छा को भी धर्म का मूल स्वीकारा गया है :—

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