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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 188 of 486

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Page 188

११६ बौधायनधर्मसूत्रम् [ राजधर्माः

तत्र साक्षी यथादृष्टं निरपेक्षप्रमाणेनावगतं यथाश्रुतमाप्तवाक्यादवगतं तथैव ब्रूयात् ॥ ९ ॥

परीक्षकाणां सम्यक्परीक्षाभावे—

पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादो गच्छति साक्षिणम् ।
पादस्सभासदस्सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥
राजा भवत्यनेनाश्च मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं यत्र निन्द्यो ह निन्द्यते ॥ १० ॥

अनु०—(निर्णय में) अधर्म का एक चौथाई अधर्म करने वाले अपराधी पर पड़ता है, एक चौथाई साक्षियों पर पड़ता है, एक चौथाई सभी निर्णायकों पर पड़ता है तथा एक चौथाई राजा पर पड़ता है। किन्तु जहाँ निन्दनीय व्यक्ति की ही निन्दा की जाती है वहाँ राजा पापरहित हो जाता है, सभासद् दोष से मुक्त हो जाते हैं और पाप अपराधी के ऊपर ही पहुँचता है ॥ १० ॥

राज्ञा सम्यक्परीक्षा कर्त्तव्येति श्लोकद्वयस्य तात्पर्यार्थः । इतरथा अधर्मस्य कृत्स्नस्य पाद् एव तत्कर्त्तारं गच्छेत् । इतरे त्रयः पादाः साक्षिसभासद्राजगा इत्युक्तम् । सम्यक्परीक्ष्य दुष्टनिग्रहः परीक्षकाणां पापप्रमोचनार्थ इति द्वितीय-श्लोकार्थः ॥ १० ॥

तत्र परीक्षावेलायां पृथक् श्लोकसञ्चयः—

साक्षिणं त्वेवमुद्दिष्टं यत्नात्पृच्छेद्विचक्षणः ॥ ११ ॥

**अनु०—**इस लिए विद्वान् न्यायकर्ता साक्षियों को उद्दिष्ट करके इस प्रकार पूछे :॥ ११ ॥

अर्थिना निर्दिष्टान् साक्षिण एवं पृच्छेदिति पदान्वयः ॥ ११ ॥

कथं पृच्छेत् ?

यां रात्रिमजनिष्ठास्त्वं यां च रात्रिं मरिष्यसि ।
एतयोरन्तरा यत्ते सुकृतं सुकृतं भवेत् ॥
तत्सर्वं राजगामि स्यादनृतं ब्रुवतस्तव ॥ १२ ॥

**अनु०—**जिस रात्रि तुम उत्पन्न हुए थे और जिस रात्रि तुम मरोगे, उन दोनों के बीच (अपने सम्पूर्ण जीवन में) तुम्हारा जो कुछ धर्माचरण का पुण्य होगा वह सभी तुम्हारे असत्य भाषण करने पर राजा को प्राप्त होवे ॥ १२ ॥