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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 169 of 486

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Page 169

पञ्चदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने सप्तमोऽध्यायः ११७

अनु०—यज्ञ के उपकरणों के बाद आज्य, आज्य के बाद हवि, हवि के बाद पशु, पशु के बाद सोम और सोम के बाद यज्ञाग्नियां आती हैं ॥ ११ ॥

उत्तरवेद्यादिषु देशसङ्कटे उपस्थिते अग्नेरनन्तरं सोमस्साद्यते। तदनन्तरं मांसादि। तदनन्तरं धानाः पुरोडाशाः। तेभ्यश्चाऽऽज्यमनन्तरं स्रुवश्च स्रुक्च। ततो जुहूरिति। एवं तावत् चित्रतुरसन्निपाते च योज्यम् ॥ ११ ॥

यथा कर्मर्त्विजो न विहारादभिपर्यावर्तेरन् ॥ १२ ॥

अनु०—जब तक करने योग्य कर्म हों तब तक ऋत्विज यज्ञाग्नि के स्थान से अलग मुँह नहीं फेरेंगे ॥ १२ ॥

आवश्यकाहृते विहाराद्व्यावृत्तिश्च, तत्र चैतत् कर्मेत्यनेन कथ्यते ॥ १२ ॥

प्राङ्मुखश्चेदक्षिणमंसमभिपर्यावर्तेत ॥ १३ ॥

अनु०—यदि उसका मुख पूर्व की ओर हो तो (अग्नि को लेकर चलते समय) दाहिने कन्धे की ओर मुँह फेरेँ ॥ १३ ॥

अग्निभिस्सह गमने सत्ययं विधिः। अग्नीनां पृष्ठतः करणं मा भूदित्युपदेशः कर्तव्यः ॥ १३ ॥

प्रत्यङ्मुखस्सव्यम् ॥ १४ ॥

अनु०—यदि पश्चिम की ओर मुख हो तो बायें कन्धे पर मुख फेरेँ ॥ १४ ॥

टि०—इस प्रकार अग्नि को ले जाते समय उसकी ओर पीठ नहीं होगी। गोविन्द स्वामी का कथन है कि इन दोनों सूत्रों से यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि अग्नि की प्रदक्षिणा कर बाहर जाया जा सकता है।

अयमपि तथैव। यद्वा—द्वाभ्यामपि सूत्राभ्यां यथास्थितानामेव पुरुषाणां प्रदक्षिणीकृत्य निर्गमनं विधीयते ॥ १४ ॥

'उत्तरत उपचारो विहारः' (१५. १.) इत्युक्तम्। तत्र निर्गमनप्रवेशनमा-मार्गमाह—

अन्तरेण चात्वालोत्करौ यज्ञस्य तीर्थम् ॥ १५ ॥

अनु०—यज्ञ का तीर्थ अर्थात् वेदि का मार्ग चात्वाल और उत्कर के बीच से होता है ॥ १५ ॥

टि०—चात्वाल वेदि से ईशानकोण परं रहता है, वहाँ से मिट्टी उठायी जाती है। उत्कर वह स्थल है जहाँ वेदिपुरीष रखा जाता है।

उत्तरवेदिपुरीषावटं चात्वालः। वेदिपुरीषनिधानदेश उत्करः। तयोर्मध्यं