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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

by महर्षि बौधायन

Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)

DevanagariHindipublished486 pages

Page 150 of 486

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Page 150
९८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ अभक्ष्याणि

अनु०—गो का अपेय दूध पीने पर तीन (दिन और) रात्रि उपवास करे॥१३॥

द्वयमेतद्बुद्धिपूर्वविषयम्। अबुद्धिपूर्वे तु पूर्वस्मिन् त्रिरात्रं गव्ये तूपवासः। आह च मनुः—'शेषेषूपवसेदहः' इति ॥ १३ ॥

पर्युषितं शाकयूषमाससर्पिश्श्रुतधानागुडदधिमधुसक्तुवर्जम् ॥ १४ ॥

अनु०—शाक, यूष, मांस, घृत, भूने गये अन्न, गुड़, दही और सत्तू इन तैयार खाद्य वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य बासी अन्न नहीं खाना चाहिए ॥ १४ ॥

टि०—पर्युषित का अर्थ है उषःकालान्तरित; उषाकाल से पहले का, रात्रि का, बासी।

पर्युषितमुषःकालान्तरितम्। शाकयूषादिवर्जं पक्वं पर्युषितमभक्ष्यमिति सम्बन्धः ॥ १४ ॥

'शुक्तानि ॥ १५ ॥

अनु०—खट्टी बनी हुई खाद्य वस्तुएं अभक्ष्य होती हैं ॥ १५ ॥

टि०—दधि खट्टा होने पर भी भक्ष्य होता है।

शुक्तानि च दधिवर्जम्। आह च मनुः—

दधि भक्ष्यं तु शुक्तेषु सर्वं च दधिसम्भवम् ।
यानि चैवाऽभिषूयन्ते पुष्पमूलफलैश्शुभैः ॥ इति ॥ १५ ॥

तथाजातो गुडः ॥ १६ ॥

अनु०—इसी प्रकार खट्टा हुआ गुड़ अभक्ष्य होता है ॥ १६ ॥

टि०—'भक्ष्य अभक्ष्य' का निर्देश करके भोजन की शुद्धि का नियम बताया गया है; भोजन की शुद्धि से ही सत्त्व अर्थात् आत्मा की शुद्धि होती है। आत्मा की शुद्धि से स्थिर स्मृति उत्पन्न होती है और उससे वेदाध्ययन का अधिकार होता है—गोविन्द। इसी प्रसंग में अगला सूत्र है।

सथाजातश्शुक्तत्वेन जात इत्यर्थः। गुडस्य पृथक्करणं अपक्वस्याऽपीक्षुरसस्य शुक्तस्य प्रतिषेधार्थम् ॥ १६ ॥

अभक्ष्याभक्ष्यप्रकरणेनाऽऽहारशुद्धिरुक्ता। तच्छुद्धौ हिं² सत्त्वशुद्धिर्भवति। सत्त्वशुद्धौ च ध्रुवा स्मृतिर्जायते। अतश्चाऽध्ययनेऽधिकार इत्यत आह—


१. शुक्तानि तथाजातो गुडः, इत्येकसूत्रतया चकारवर्जं पठितं मूलपुस्तकेषु ।
२. आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः। सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः, इति स्मरणात् ।