बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
by महर्षि बौधायन
Source: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (origin)
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Read in contextअष्टमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ४९
.अङ्गुल्यङ्गुष्ठयोर्मध्यं पित्र्यम् । तथा च वसिष्ठः-‘प्रदेशिन्यङ्गुष्ठयोरन्तरे पित्र्यम्’ इति । ऋज्वन्यत् ॥ १३ ॥
इदानीमाचमन एव किञ्चित्पर्युदस्यति—
नाङ्गुलीभिर्न संबुद्बुधं सफेनाभिर्नोष्णाभिर्न क्षाराभिर्न लवणाभिर्न कटुकाभिर्न कलुषाभिर्न विवर्णाभिर्न दुर्गन्धरसामिः ॥ १४ ॥
**अनु०—**अङ्गुलियों से निकले हुए, बुल-बुले से युक्त, फेन वाले, गरम किये गये, किसी अन्य वस्तु को मिलाकर क्षार बनाये गये, नमक से युक्त, कड़वे, गन्दे, बदले हुए रंग वाले, दुर्गन्ध वाले जल से आचमन न करे ॥ १४ ॥
**टि०—**गोविन्द स्वामी के अनुसार यदि ये दोष स्वभावतः आये हों तो वह जल अयोग्य नहीं होता, उदाहरण के लिए सूर्य की किरणों द्वारा उष्ण बना जल, स्वभाव से खारा जल, वर्षा के कारण गन्दा बना जल, आचमन के लिए अयोग्य नहीं माना जाता ।
अङ्गुलोत्स्राविताभिः अद्भर्नाऽऽचामेत् इति सम्बन्धः । बुद्बुदः स्फोटः । सफेनाः सडिण्डीराः । उष्णाभिः अग्निना, नाऽऽदित्यरश्मिभिः । क्षाराश्च द्रव्यानन्तरसंक्रमणात्, न स्वभावतः । कालुष्यमपि कारणान्तरेण, न वर्षादिना । विवर्णत्वमपि तथा, न तु भूगुणेन ॥ १४ ॥
अथाऽऽचमन एव कर्तुरवस्थाः पर्युदस्यन्ते—
न हसन्न जल्पन्न तिष्ठन्न विलोकयन्न प्रह्वो न प्रणतो न मुक्तशिखो न प्रावृतकण्ठो न वेष्टितशिरा न त्वरमाणो नाऽयज्ञोपवीतो न प्रसारितपादो नाऽऽबद्धकक्ष्यो न बहिर्जानुः शब्दमकुर्वन् त्रिरापो हृदयंगमाः पिबेत् ॥ १५ ॥
**अनु०—**हँसते हुए आचमन न करे, बोलते हुए आचमन न करे, खड़े होकर न करे, चारो ओर देखते हुए न करे, सिर या शरीर को झुकाए हुए आचमन न करे, शिखा खोल कर अथवा कण्ठ को वस्त्र से ढककर आचमन न करे, सिर को आच्छादित करके आचमन न करे, जल्दीबाजी में, यज्ञोपवीती हुए बिना, पैरों को फैलाकर, कटि को वस्त्र से बाँधे हुए, दाहिने हाथ को घुटनों से बाहर किये हुए आचमन न करे, कोई शब्द किये बिना तीन बार इस प्रकार जल पिये जो जल हृदय तक पहुँचे ॥ १५ ॥
प्रह्वः अधोमुखः । प्रणतो वक्रकायः । ननु ‘आसीनश्शौचमारभेत’ इत्युक्तम् किमिति तिष्ठतः प्रतिषेधः ? उच्यते—तत्र उपवीतसाहचर्यादासनयोगविधानं
७ बौ० ध०