आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
(१) जल ३ भाग रहता है। (२) इसमें जो पोषक द्रव्य (औजस) रहता है वह बहुत महत्व का है। यह अन्य द्रव्यों की अपेक्षा इसमें अधिक भी रहता है। यह मूल में अंगार, (Carbon) उज्जन, (Hydrogen) मरुत, (nitrogen) मित्र (Oxygen) स्फुर (phosphorus) और गंधक इन वायवीय द्रव्यों से बनाहुआ है। (३) इसमें तेज या तैजस्द्रव्य (Lecithin) संज्ञक वसा रहती है। यहाँ की इस वसा में स्फुर वायु भी रहता है। (४) इसके अतिरिक्त इसमें क्षार भी रहते हैं।
उक्त ओज और तेज संज्ञक द्रव्य अन्यत्र भी रहते हैं पर उनमें स्फुरवायु नहीं रहता। किंतु जीवनरसगत इन द्रव्यों
उसका अनुप्रविष्ट भाग ( शिर, ग्रीवा व धड का कुछ अंश ) फलगत द्रव्य में घुलकर उस से ‘बैजिक-जीवनायतनमूल,’ और आकर्षकबिंदु सहित एक आकर्षक केंद्र बनता है। उक्त बैजिक जीवनायतनमूल, फलजीवनायतनमूल के पास जाता है और दोनों आपस में मिलकर घुल जाते हैं। इस घोल से एक जीवनायतन बनता है। इस संस्कार को ‘उपकार’ कहते हैं। यह नूतन जीवनायतन, बीज व फल के आधरे किंतु समान ‘जीवनायतनमूलतंतुओं से युक्त रहता है और इसके साथ आकर्षकबिंदु सहित दो आकर्षककेंद्र रहते हैं। इसी को ‘वंशांकुर’ कहते हैं। आगे इस वंशांकुर का औद्भिज प्रत्यक्ष प्रज्ञानन होकर उसको क्रमशः वंशांकुरगुच्छ, कल्ल, पाकप्रक्रिया-द्वारा संतानिका, कला, खोत, गर्भ आदि अवस्थाएँ प्राप्त होती हैं।