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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते ।

कर्मणः प्राकृताद्वाग्निर्द्वेष्टि वापि विरोधिनाम् ॥

दोष प्रकृति वैशेष्यं नियतं वृद्धि लक्षणम् ।

दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्द्वेष्टिश्चैवं परीक्ष्यते ॥

( च. सू. अ. १८ )

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि इन अंशों में प्राकृत वैकृत शब्द सामान्यतः अकुपित कुपित के समानार्थक हैं और प्राकृत कार्यों में मुख्यतः उन कार्यों का उल्लेख किया गया है जिनकी भित्ति पर तदुत्तर काल में वातपित्तक्षेपमाओं के पांच २ प्रकार किये गये ।

इसके बाद जब ऋषियों का ध्यान भिन्न २ मनुष्यों की भिन्न २ ' प्रकृतियों ' पर और उनके कारणों पर आकृष्ट हुआ तब प्राकृत वैकृत शब्दों की व्याख्या भी बदल गई ।

प्रकृति के विषय में यद्यपि सामान्यतः यह स्वीकार कर लिया गया था कि " प्रकृति में जाति, कुल, देश, काल, वय और आत्मा ( निज ) के भावविशेष शामिल रहते हैं और तदनुसार वह जातिप्रसक्ता, कुलप्रसक्ता, देशानुपातिनी, कालानुपातिनी, वयोनुपातिनी तथा प्रत्यात्मनियता होती है " ( च. इ. अ. १ ) तथापि इनकी सबकी वह में वे मुख्यतः प्रत्यात्मनियता को ही देखते थे ।