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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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आयुर्वेद-दर्शन

विकृत अवस्था में संधि शैथिल्य का होना भी पाया गया था। इनकी दृष्टि इस द्रव्य के श्लेषण धर्म पर अधिक थी। इस श्लेषणधर्म को ये 'बल' कहते थे और उनको इस बल का ओजगत बल के साथ अभिन्नत्व प्रतीत हो गया था। परिणाम यह हुआ कि वे इस द्रव्य में और ओज में भी अभिन्नत्व प्रस्थापित करने लगे। जैसा कि:—

प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।

स चैवोजः स्मृतः काये सचपाप्मोप दिश्यते ॥

( सु. सू. अ. १७ )

इस पर से व्यक्त होता है। इसमें प्रकृत अवस्थापन्न पिच्छिल-गुण श्लेष्मा को बलोत्पादक (अथवा बल) और उसकी विकृतावस्था को मल (अथवा मलवर्गीय) कहा गया है। सिवाय श्लेष्मा को ओज कहकर यह व्यक्त किया है कि ओज, श्लेष्मा का ही प्रकार है। सारांश पहिले वर्गीकरण के समय जिस ओज को श्लेष्मा से भिन्न माना जाता था उसका तदुत्तर काल में श्लेष्म शब्द में ही समावेश किया जाने लगा। अब जब कि ओज का घटक श्लेष्मा ही सिद्ध हुआ तब ओजगत बल को भी श्लेष्मा का धर्म मानना तर्कसंगत था। किंतु इस बल के विषय में हम आगे चलकर देखेंगे कि तदुत्तर काल में इस बल को वायु का प्रकार कहने लग गये थे।