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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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ब्रायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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में इस को 'तेज' शब्द से ही संबोधित किया है और उसका ओज व बल के सहस्र विवेचन किया है। यथा:-

तेजोऽप्योभ्रयं क्रमशः पञ्चमानानां धातूनाम भिनिर्वृत्तामंत-
रस्थं स्नेहजातं वसाल्यं क्षीणां विशेषतो भवति। तेन मार्दव
सौकुमार्यं श्रुद्धरपोभतोत्साहदृष्टिस्थितिपात्तिकीतिद्वितीयो भवति।
(सु. सू. अ. १५)

अर्थात् तेज भी क्रमशः परिपाचित होनेवाले धातुओं से निकलनेवाला 'वसा'ल्य स्नेह समुदाय है। यह अग्नि-गुणात्मक होकर स्त्रियों में विशेष (विशिष्ट प्रकार का) रहता है। इस से तनुमार्दव, सुकुमारपन, रोम में मृदुता व अल्पता, उत्साह, दृष्टिस्थिति, पाचन, कांति इ. रहते हैं।

शरीरगत स्नेहजात को पाश्चात्य Fats अथवा Lipoids कहते हैं। इसी का एक उत्तम प्रकार Lecithin है। यह रक्त के श्वेत कणों में, अंडे में और भिन्न २ शरीररसों में विशेषतः अणुअवयवों के जीवनरस में रहता है। आयुर्वेदांतर्गत उक्त वसाल्य तेज भी इस से अतिरिक्त वस्तु नहीं है। नव्य-विज्ञान-दृष्ट्या भी यह अग्निगुणात्मक है। क्योंकि प्राणवायु, के संबंध से इसका व्यवहन होना और उससे ऊष्मा या ताप की वृद्धि होना विज्ञान सम्मत है। स्त्रियों में अर्थात् स्त्रियों के 'फल' में यह विशेष प्रकार का होता है। गर्भांकुर में