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आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

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प्रस्तावना

संसार के समस्त विज्ञान, जिस तरह भाव स्वभावों के विशिष्ट प्रकार के वर्गीकरण पर अथवा अन्वर्थ व्यतिरेक पर अपना पृथक् अस्तित्व रखते हैं उस तरह आयुर्वेद भी अपना पृथक् अस्तित्व रखता है। दूसरी भाषा में आयुर्वेद का तंत्र उसके विशिष्ट प्रकार के दार्शनिक सिद्धांत पर अवलंबित है। इस आयुर्वेद दर्शन में आयुर्वेद के दार्शनिक सिद्धान्त को ही जानने का यथामति यत्न किया गया है। इस प्रवृत्ति का एक कारण यह भी है कि आयुर्वेद के दार्शनिक विधानों का ऐतिहासिक दृष्टि से अभ्यास करते हुए जिन अतीत घटनाओं पर प्रकाश पड़ रहा है और भविष्य में पड़ना संभव है उन पर यदि विचार किया जाय तो केवल आयुर्वेदिक ही नहीं बल्कि समस्त आर्य विज्ञानोंतिहास की कई उलझने सरलता से सुलझ सकती हैं।

प्रत्येक दर्शन के सामान्यतः दो प्रतिपाद्य विषय होते हैं; सृष्टि विज्ञान और अध्यात्म। इन दोनों के विषय में सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि सचेतन अचेतन द्रव्यों के उत्पादक विनाशक पदार्थों का अथवा द्रव्यगुण कर्मों का प्रधानतया विचार करना सृष्टिविज्ञान का विषय है और इनकी तह में आत्मा, विराट्पुरुष, या ब्रह्म के अस्तित्व का अनुभव करना अध्यात्म का। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि मानुषी बुद्धि ने प्रथम सृष्टिविज्ञान का अभ्यास किया और इसके बाद अध्यात्म का। आयुर्वेद दर्शन में यद्यपि दोनों विषयों का प्रातिपादन है तथापि उसका प्रधान विषय सृष्टि विज्ञान