आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 211 of 235
Read in contextपरिशिष्ट
१९१
इसमें अन्य पित्तस्थानों का अर्थात् अन्य पाचक पित्तों का अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी याकृत पाचक पित्त को सर्वे श्रेष्ठ और सर्वोपकारक कहा गया है। और यही कारण है कि आयुर्वेद में इस पाचक पित्त का कुछ अधिक विवेचन उपलब्ध होता है। यहाँ 'ओष्ण्यं तैश्चण्यं लाघवमनतिस्नेहो वर्णश्च शुक्लारुणवर्णो गंधश्च विलो रसो च कटु काम्लो पित्तस्यात्मरूपाणि, एवं विधत्वाच्च कर्मणः स्नालक्षण्यभिदमस्य भवति' ( च. सू. अ० २० ) और 'पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीरुं पीतं तथैव च। उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्बुकेव च ( सु. सू. अ. २१ ) इन विधानों को ध्यान में रखना चाहिये। इनका विश्लेषण व संशोधन करना होगा।
अब यह जाना गया है कि महास्रोत की श्रेष्ठधारा कला में उदकोत्पादक व पित्तोत्पादक सहजों पिंड हैं और वे अपरा ( जरायु ) से ( जैसा कि कांच से दीप ) आन्च्छादित भी हैं। अतः इनको ही 'सोममंडल' और 'सूर्य मंडल' कहना उचित है।
स्थान विभागानुसार पाचक पित्त के पांच प्रकार होते हैं और उनके द्वारा भिन्न २ अंशों का पाचन होता है। जैसाकि:—
(१) मुखगत पाचकपित्तः—यह 'लुलुकाधःस्थपिंडों' से पैदा होता है। इसमें 'लालासत्व' नामक अभिपूत रहते हैं। इससे पिष्ट षट्पिंडों के कण बारिक होते हैं। 'पष्टिक' अन्नसे 'पिष्ट सत्व' और पिष्टसत्व से 'पैडीशर्करा' का बनना इसीसे आरंभ होता है।
(२) आमाशयस्थ पाचकपित्तः—इसका वास्तविक नाम 'अस्लपित्त' है। यह अमाशयस्थ पिंडों से पैदा होता है। इसमें 'पाचक सत्व' नामक अभिपूत रहते हैं। किंतु इसमें पाचन के समय लाला