आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextपुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत
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त्रिगुण और त्रिधातुओं में जन्यजनक संबंध नहीं माना जाता। अनात्मवादी, ज्ञान अथवा सत्त्व को धातुपंचक का अथवा त्रिधातुओं का परिणाम कहते थे। इसमें कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है। पर आश्चर्य इस बात का है कि आत्मवादियों में भी एक संप्रदाय ऐसा था जो कि त्रिधातुओं से मन की उत्पत्ति मानता था। जैसा कि श्वेताश्वतरोपनिषद् के “ अग्निर्वत्राभिमध्यते वायुर्वत्राभिधुज्यते। सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः”। ( श्वे. ४. अ. २ मं. ६ ) इस मंत्र पर से सिद्ध होता है। अर्थात् यह संप्रदाय ज्ञान की वृत्तियों को जन्य और कर्म की वृत्तियों को जनक मानता था। ठीक इसके विपरीत अर्थात् कर्म को जन्य और ज्ञान को जनक मानने वाले संप्रदाय भी थे। इनके मत से कर्तृत्व, चेतना से भिन्न नहीं था। अतः ये सृष्ट्युत्पत्ति का आरंभ ज्ञान से अर्थात् त्रिगुणात्मिका बुद्धि से करते थे और त्रिगुणात्मक अहंकार से आकाशादिकों की उत्पत्ति का विधान करते थे। किंतु पुनर्वसु आत्रेय को षड्धातुवाद का और प्रजापतिवाद का ही मत मान्य था। अतः वे त्रिगुण व त्रिधातुओं में जन्य-जनक संबंध स्वीकार नहीं करते थे।
१ इन संप्रदायों ने अथवा उनके उत्तराधिकारियों ने वायु को रजोबहुल, पित्त को सत्वगुणोत्तर और क्षेप्मा को तमोगुणभय कहने की प्रथा झूठ की जो अबतक भी विद्यमान है। किंतु पुनर्वसु आत्रेय को यह सम्मत नहीं था।