Skip to content
SarvaKosh
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक

Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)

DevanagariHindipublished235 pages

Page 183 of 235

Read in context
Page 183

पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

१६३

भूत एवं स्वतःसिद्ध पदार्थ है। यह अपनी त्रिपाद अमृतत्व अर्थात 'पर' अवस्था में निर्वाकार है और एकांश प्रजापति अवस्था में इससे सत्त्व तथा शरीर संज्ञक 'भावों' का उद्भव होता है। तात्विक भाषा में सत्त्व और शरीर शब्द क्रमशः ज्ञान व कर्म के वाचक हैं। ज्ञातृत्व और कर्तृत्व दोनों ही आत्मनिष्ठ भिन्न २ 'वृत्तियाँ' (इनको 'चित्तवृत्ति' और 'प्राणवृत्ति' भी कहते हैं) हैं। आत्मा, ज्ञाता व कर्ता होने के कारण सृष्ट्युत्पत्ति के समय उक्त वृत्तियाँ ही सत्त्व और शरीर में परिणत होती हैं।

तहां ज्ञातृत्व, सर्वे प्रथम तीन प्रकारों में परिणत होता है। उन प्रकारों को शुद्ध, रजस् और तमस् कहते हैं। "तत्र शुद्धमदोषमाख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यातं रोपांशत्वात्, तामसमपि सदोषमाख्यातं मोहांशत्वात्" (च. शा. अ. ४) अर्थात विशुद्ध व कल्याणांशयुक्त ज्ञान को शुद्ध, किंचित् अशुद्ध व रोषयुक्त ज्ञान को राजस् और अशुद्ध मोहांशयुक्त ज्ञान को तामस् कहते हैं।

कर्तृत्व, सर्वे प्रथम त्रिधातुओं में परिणत होता है। यद्यपि षड्धातुवादानुसार चेतनाधातु का कर्तृत्व, भूतगुणों में अर्थात अप्रतीघातकत्व, चक्षुत्व, षण्णत्व, द्रवत्व आर खरत्व में परिणत होता है तथापि इस विषय में पुनर्वसु आत्रेय, प्रजापतिवाद् के ही अनुयायी मालूम होते हैं। और यह भी