आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextभारद्वाज का स्वभाववाद
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दोषः स्यात्; एवमुक्ते हि आत्मा, सत्सु इन्द्रियेषु 'ज्ञः' स्यात् असत्सु 'अज्ञः'। यत्र च एतदुभयं संभवति ज्ञत्वम् अज्ञत्वं च सविचारआत्मा निर्विकारोज्ञश्च ? यदि च दर्शनादिभिरात्मा विषयान्वेत्ति; निरिन्द्रियो दर्शनादिविरहात् अज्ञः स्यात्, अज्ञत्वात् अकारणम्, अकारणत्वाच्च 'न आत्मा' इति। चागवस्तुमात्रमेतत् (आत्मजः पुरुष इति) वचनमनर्थकं स्यात् इति हो वाच भारद्वाजः।" (च. शा. अ. ३)
भारद्वाज की इन दलीलों का पुनर्वसु आत्रेय ने बहुत ही विस्तृत और निरपवाद उत्तर दिया है जिसको कि हम आगे अन्तिम निर्णय के समय उद्धृत करेंगे। प्रस्तुत में भारद्वाज के आत्मविषयक तथा सत्त्वविषयक मंतव्यों पर ही प्रकाश डालने का हमारा उद्देश है और वह उनके उक्त विधानों पर से सफल होता है। इन विधानों पर से स्पष्ट होजाता है कि भारद्वाज के स्वभाववाद में आत्मा और सत्त्व दोनों का स्वतःसिद्ध अस्तित्व स्वीकार ही नहीं किया जाता।
निम्न लिखित दो पंचाकरण भी मूल में भारद्वाजीय होंगे किंतु इनमें अन्य संप्रदायों ने कुछ परिवर्तन किया हुआ मालूम होता है। ऐसा कि:-
“सर्वद्रव्यं पांचभौतिकम् (पंचधातुकम् इति भारद्वाजीये) अस्मिन्नेवार्ये तत् चेतनावत् अचेतनं च। तस्य गुणाः