आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 134 of 235
Read in contextभारद्वाज का स्वभाववाद
११३
में खरत्व, जल में द्रवत्व, अग्नि में उष्णत्व वायु में चलत्व, और आकाश में अप्रतीघातकत्व स्वभावतः रहता है।
भारद्वाज के इस स्वभाववाद को ही हमने ‘धातुपंचकवाद’ के नाम से संबोधित किया है। भारद्वाज, आयुर्वेद की पंचात्मकलोकपक्षीय शाखा के आद्य प्रवर्तक हैं। किसी समय इतका तंत्र बहुत विस्तृत रूप में विद्यमान था। किंतु उपलब्ध वाङ्मय में दो ही चार अंश ऐसे मिलते हैं जिनको कि निश्चय से भारद्वाजीय कहा जा सकता है। मालूम होता है कि तदुत्तरकालीन पंचात्मकलोकपक्षीयों ने जो कि आकाशदिकों को ‘अभूत’ मानने के बजाय ‘भूत’ मानने लगे थे; इनके विधानों में शाब्दिक परिवर्तन किया। अस्तु.
भारद्वाज, मधुरादि आस्वादों को धातुपंचक में विभाजित करते थे जैसाकि उनके रसपरिषदस्थ “पंच रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजो भौमोदकामेयवायवीयांतरिक्षाः” (च. सू. अ. २६) इस विधान पर से ज्ञात होता है।
गर्भोत्पत्ति विषयक अर्थात् ही पुरुषोत्पत्ति विषयक “गर्भस्तु खलु अंतरिक्षवाय्वमितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठानभूतः” यह विधान भारद्वाज का ही है और तदनुसार “तत्र शरीरं नाम चेतनाधिष्ठानभूतं पंच महाभूत (भारद्वाज की भाषा में ‘पंचधातु’) विकार समुदायात्मकम्”