आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextभद्रकाप्य का कर्मवाद
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गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्तं मनः सदापं बलवच्च कर्म ॥
धर्म्याः क्रिया हर्षनिमित्तमुक्ता ततोऽन्यथा शोक्रवशं नयंति ।
शरीर सत्व प्रभवास्तु दोषास्तयोः रवृत्त्या न भवंति भूयः ॥
रूपस्य सत्वस्य च संततिर्या नोक्तस्तदादिर्महि सोऽस्ति कश्चित् ।
तयोरव्याधिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च ॥
सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्व गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् ।
जितेन्द्रियं नानुतपंति रोगास्तत्कालयुक्तं यदिनास्ति देवम् ॥
दैवं पुरा यत्कृतमुच्यते तत् तत्पौरुषं यत्विह कर्म दृष्टम् ।
प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुर्हि समः स एव ॥
( च. शा. अ. २ )
इसके अतिरिक्त भी चरकसंहिता में जहाँ तहाँ कर्म पर विचार किया गया है। यहाँ अनेक बातें विचारणीय हैं किंतु विस्तार भय के कारण उनको छोड़ देना ही आवश्यक है।
भद्रकाप्य, वातकलाकलीय परिषद् में उपस्थित नहीं थे। हमारे मत से काप्य और भद्रकाप्य भिन्न २ ऋषि हैं। क्योंकि भद्रकाप्य के स्मृष्टिविज्ञान में शब्दादिगुण प्रधानता वादित्व है।