आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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आयुर्वेद-दर्शन
स्वतः सिद्ध अस्तित्व प्रतीत हो जाने के कारण वे आकाशादिकों को चेतनाधातु के 'गुण' कहते थे। अतः उक्त विधान में उन्होंने यह कहा है कि 'चेतनाधातु, आकाशादिगुणों को व्यक्त करता है। सारांश धातुपञ्चकवादी जिन गुणों को 'स्वभाव' कहते हैं उनको ही षड्धातुवादी आकाशादि नामों से संबोधित करते हैं। क्योंकि उनके मत से आकाशादिक, अभिव्यक्ति के समय गुणमात्र रहते हैं।
किंतु यहाँ यह जानना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति के समय आकाशादिक, अप्रतीघातकत्वादि गुणमात्र रहते हैं अथवा शब्दादि गुणमात्र रहते हैं ? और इस विषय में षड्धातुवादियों का क्या कथन है ?
इस तरह देखा जाय तो षड्धातुवादी आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि गुण मात्र ( आकाश-अप्रतीघातकत्व, वायु-चलत्व, अग्नि-उष्णत्व, जल-द्रवत्व, पृथ्वी-स्वरत्व ) ही स्वीकार करते हुए प्रतीत होते हैं। क्योंकि षड्धातुवादियों का यह कथन कि 'इन गुणों की अभिव्यक्ति व्यक्त, व्यक्ततर, व्यक्ततम, इस क्रम से होती है;' वैज्ञानिक दृष्ट्या शब्दादि तन्मात्राओं में उत्तनी चरितार्थ नहीं होती जितनी कि अप्रतीघातकत्वादि लक्षणों या गुणों में। और इसी हेतु से षड्धातुवादी, गर्भगत गुणोपादन में अप्रतीघातकत्वादि गुणों के स्थान पर छिद्र, प्राण, संताप, छेद, मूर्ति