आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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Read in contextबार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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प्रकृतिभूताः पुरुषमन्यापत्रेन्द्रियं बलवर्णसुलोपपन्नमायुषा महता
उपपादयति, सन्ध्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्यकांसा इव निःश्रेयसेन
महता पुरुषमिहचामुष्मिन्न लोके, विकृतास्त्वेन महता विपर्य-
येणोपपादयति ऋतवःक्षय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो-
पधातकाल इति ।
इस पर से यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस परिपद में
भारद्वाज को छोड़कर अन्य सब ऋषि, पंचात्मक लोकपक्षीय
नहीं थे अपितु द्विधात्मक लोकपक्ष को त्रिधात्मक बनाने
वाले थे । इसमें वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक स्वरूप पर
विचार हुआ और उनका संबंध वायुअग्निसेमसंज्ञक
जागतिक धर्मों के साथ प्रस्थापित किया गया । ये समस्त
ऋषि गुर्विदि गुणों को प्रधान माननेवाले थे । इनमें
कांकायन और पुनर्वसु आत्रेय आत्मा को स्वतःसिद्ध कहते
थे और शेष सब ऋषि आत्मा और सत्व को रसज अथवा
त्रिधातुज मानते थे । पुनर्वसु आत्रेय को (और कांकायन को भी)
त्रिधात्वात्मक सिद्धांत यद्यपि स्वीकृत था तथापि सर्वांश में
वे उससे सहमत नहीं थे । क्योंकि इसमें आत्मा या प्रजापति
का स्वतः सिद्ध अस्तित्व नहीं माना जाता था, अतः उन्होंने
अन्यत्रैकान्तिक 'वचनात्' कहकर अपने मत को सुरक्षित रक्खा ।
कुछ लोग दो बार्योविदों की कल्पना करते हैं पर वह
कल्पना ही है । आगे चलकर हम देखेंगे कि इस त्रिधातु-