आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
Page 106 of 235
Read in context८४
आयुवैद-दर्शन
अग्नीषोमवाद् का उक्त स्वरूप ध्यान में रखकर ही अग्नीषोमलोकपक्षियों के कथन का विचार करना होगा। कालवादी, यद्यपि अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वयों का अस्तित्व स्वीकार करते थे तथापि उनका यह कथन था कि ‘अग्नीषोम संज्ञक धर्मों के भी तह में ‘काल’ संज्ञक महती गति का अस्तित्व है’। त्रिधातुसिद्धांतवादी भी अग्नीषोम का अस्तित्व स्वीकार करते थे पर उनको अग्नीषोमवादियों का ‘वायु’ विषयक औदासिन्य मान्य नहीं था।
त्रिधातुसिद्धांतवादियों का ‘वायु’ शब्द धर्म बोधक (भी) है। धातुपंचकवादी जिस ‘वायु’ संज्ञक ‘द्रव्य’ को धातुप्रसादगत ‘करणवृत्ति’ रूप चेष्टाओं का जनक मानते थे उस प्राणद्रव्य के भी तह में इनको ‘वायु धर्म’ का अस्तित्व प्रतीत हो रहा था। इस धर्म की प्रतीति अन्यत्र भी होगई थी जैसा कि ‘हृन्मांस’ गत ‘प्रस्पंदन’। (इस धर्म को ओजगत धर्म भी कहा गया है) इस धर्म को वे अग्नीषोम से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। और इस-करणवृत्ति रूप वायु धर्म को ही भिन्न २ व्यापारानुसार प्राण, उदान, समान, व्याप्त, अपान कहते थे। लोक में इस वायु-धर्म का संबंध ‘काल’ संज्ञक महान् धर्म के साथ किया जाने लगा था। सरांश त्रिधातुसिद्धांतवादी, वंशांकुर-गत वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध देहलोकगत वायु, अग्नि,