अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextआहृता अस्माकं वीरा आ पत्नीरिदमस्तकम्.. (५)
मैं गायों का दूध लाता हूं तथा अन्न एवं जल भी लाता हूं. मैं पुत्र, पौत्र एवं पत्नी को ले
आया हूं. इन सब से मेरा घर पूर्ण रहे. (५)
सूक्त-२७ देवता—ओषधि, इंद्र, रुद्र
नेच्छत्रुः प्राशं जयति सहमानाभिमूरसि.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (१)
हे ग्वारपाठा नामक जड़ी! तुम्हारा सेवन करने वाले वक्ता को उस का विरोधी न जीत
सके. तुम्हारा स्वभाव शत्रु को सहन करने का है, इसीलिए तुम प्रतिवादी को पराजित कर
देती हो. मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन को तुम पराजित करो. हे
ओषधि! मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (१)
सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (२)
हे ग्वारपाठा नामक जड़ी! सुंदर पंखों वाले गरुड़ ने विष दूर करने के लिए तुम्हें खोज
कर प्राप्त किया था. आदि वाराह ने अपनी थूथन से तुम्हें खोदा था. मुझ प्रश्न पूछने वाले से
जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित करो. हे ओषधि! मेरे विरोधी वक्ताओं का
गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (२)
इन्द्रो ह चक्रे त्वा बाहावसुरेभ्य स्तरीतवे.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (३)
हे ग्वारापाठा नामक जड़ी! इंद्र ने असुरों की हिंसा करने के लिए तुम्हें अपनी भुजाओं
में धारण किया था. मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित
करो तथा मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (३)
पाटामिन्द्रो व्याश्नादसुरेभ्य स्तरीतवे.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (४)
इंद्र ने असुरों की हिंसा करने के लिए ग्वारपाठा नाम की जड़ी को खाया था. हे
ग्वारपाठा! मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन्हें तुम पराजित करो तथा
मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से बोल न सकें. (४)
तयाहं शत्रून्त्साक्ष इन्द्रः सालावृकाँ इव.
प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे.. (५)
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