अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूर्य की किरणें सभी प्राणियों को जाग्रत करती हैं. प्राणी सूर्य रूपी इंद्र का दर्शन कर
सकें, इसलिए ये किरणें सूर्य को ऊपर उठाती हैं. (१३)
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः. सूराय विश्वचक्षसे.. (१४)
जिस प्रकार रात के बीतते ही चोर भाग जाते हैं, उसी प्रकार सूर्य के उदय होते ही
आकाश से तारे भाग जाते हैं. (१४)
अदृश्रन्नस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु. भ्राजन्तो अग्नयो यथा.. (१५)
सूर्य की किरणें ज्ञान देने वाली एवं अग्नि के समान दीप्त हैं. ये किरणें मनुष्यों का
अनुकरण करती हैं. (१५)
तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य. विश्वमा भासि रोचन.. (१६)
हे इंद्र! तुम संसार रूपी नाव के समान हो. तुम सब को देखने वाले हो, सब को ज्योति
प्रदान करते हो और सब के प्रकाशक हो. (१६)
प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्ङुदेषि मानुषीः. प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दृशे.. (१७)
हे इंद्र! तुम मनुष्यों और देवों के कल्याण के लिए उदय होते हो. तुम सब के सामने
प्रकाशित होते हो. (१७)
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ अनु. त्वं वरुण पश्यसि.. (१८)
हे पाप का नाश करने वाले इंद्र! जो पुरुष प्राचीन काल के पुण्यात्मा लोगों के मार्ग पर
चलते हैं, तुम उन्हें सदैव कृपा की दृष्टि से देखते हो. (१८)
वि द्योमेषि रजस्पृथ्वहर्मिमानो अक्तुभिः. पश्यंजन्मानि सूर्य.. (१९)
हे इंद्र! तुम सब पर कृपा करते हो तथा उन्हें देखते हुए रात्रि और दिन का निर्माण करते
हो. तुम तीनों लोकों में विचरण करते हो. (१९)
सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षणम्.. (२०)
हे सूर्यरूपी इंद्र! तुम्हारी चमकती हुई सात किरणें घोड़ों के रूप में तुम्हारे रथ में जुड़ी
रहती हैं. वे ही तुम्हारा वहन करती हैं. (२०)
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तभिः.. (२१)
इंद्र ने सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ा है. घोड़े इंद्र की इच्छा के अनुसार अपने ढंग से
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