अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 945 of 1063
Read in contextशिक्षेयमस्मै दित्सेयं शचीपते मनीषिणे. यदहं गोपतिः स्याम्.. (२)
हे शचीपति इंद्र! जब तुम्हारी कृपा से मैं गायों से संपन्न हो जाऊंगा, तब इस स्तुति करने
वाले विद्वान् को धन देने की इच्छा करता हुआ इसे धन दे सकूंगा. (२)
धेनुष्ट इन्द्र सूनृता यजमानाय सुन्वते. गामश्वं पिप्युषी दुहे.. (३)
हे इंद्र! हमारी सच्ची स्तुति तुम्हें उसी प्रकार तृप्त करे, जिस प्रकार गाएं लोगों को अपने
दूध से तृप्त करती हैं. यह स्तुति सोम का संस्कार करने वाले यजमान की वृद्धि करे. यह
स्तुति गौ आदि अभीष्ट पदार्थों को प्रदान करती है. (३)
न ते वर्तास्ति राधस इन्द्र देवो न मर्त्यः. यद् दित्ससि स्तुतो मघम्.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारे धन को कोई रोक नहीं सकता. देवगण तुम्हारे धन को अन्यथा नहीं कर
सकते तथा मनुष्य तुम्हारे धन को मिटाने में समर्थ नहीं हैं. हमारी स्तुति से प्रसन्न हो कर तुम
यदि हम को धन देना चाहो, उस धन को कोई नष्ट नहीं कर सकता. (४)
यज्ञ इन्द्रमवर्धयद् यद् भूमिं व्यवर्तयत्. चक्राण ओपशं दिवि.. (५)
जो इंद्र आकाश में मेघ को विस्तृत करते हैं तथा वर्षा के जल से धरती को गीला करते
हैं, वे ही वर्षा के जल से भूमि के धान्यों को पुष्ट बनाते हैं. (५)
वावृधानस्य ते वयं विश्वा धनानि जिग्युषः. ऊतिमिन्द्रा वृणीमहे.. (६)
हे इंद्र! तुम स्तुतियों से वृद्धि प्राप्त करते हो. हम तुम्हारी उस शक्ति का वरण करते हैं,
जो शत्रु के धनों को जीतने वाली और हमारी रक्षा करने वाली है. (६)
सूक्त—२८ देवता—इंद्र
व्य १ न्तरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना. इन्द्रो यदभिनद् वलम्.. (१)
सोमपान से उत्पन्न शक्ति के द्वारा जब इंद्र ने मेघ को विदीर्ण किया, तब वर्षा के जल से
अंतरिक्ष की वृद्धि की. (१)
उद्गा आजदङ्गिरोभ्य आविष्कृण्वन् गुहा सतीः. अर्वाञ्चं नुनुदे वलम्..
(२)
इंद्र ने अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के लिए गुफा में छिपी गायों को प्रकट किया तथा उन्हें
निकाल कर उन का अपहरण करने वाले राक्षसों को अधोमुख कर के मिटा दिया. (२)
इन्द्रेण रोचना दिवो दृढानि दृंहितानि च. स्थिराणि न पराणुदे.. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*