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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 936 of 1063

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Page 936

इन्द्रं वृत्राय हन्तवे पुरुहूतमुप ब्रुवे. भरेषु वाजसातये.. (५)
युद्धभूमि में अनेक योद्धाओं द्वारा विजय पाने के लिए बुलाए गए एवं यजमानों द्वारा
अन्न प्राप्ति के लिए बुलाए गए इंद्र की मैं स्तुति करता हूं. (५)
वाजेषु सासहिर्भव त्वामीमहे शतक्रतो. इन्द्र वृत्राय हन्तवे.. (६)
हे शतक्रतु इंद्र! तुम संग्रामों में शत्रुओं को पराजित करने वाले हो. मैं तुम्हारी स्तुति
करता हूं. मैं वृत्र अर्थात् पाप के नाश के लिए तुम्हारी स्तुति करता हूं. (६)
द्युम्नेषु पृतनाज्ये पृत्सुतूर्षु श्रवःसु च. इन्द्र साक्ष्वाभिमातिषु.. (७)
हे इंद्र! धन प्राप्ति के लिए युद्ध उपस्थित होने पर, अन्न की प्राप्ति के अवसर पर, पापों
और शत्रुओं का नाश करने के निमित्त तुम हमारा सहयोग करो. (७)
सूक्त—२० देवता—इंद्र
शुष्मिन्तमं न ऊतये द्युम्निन पाहि जागृविम्. इन्द्र सोमं शतक्रतो.. (१)
हे इंद्र! तुम हमारी रक्षा के निमित्त अतिशय बल कारक, बुरे स्वप्न का नाश करने वाले
तथा तेज से दमकते हुए सोमरस का पान करो. (१)
इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु. इन्द्र तानि त आ वृणे.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारा जो बल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद—पांच वर्णों में है, हम
उसी बल की याचना करते हैं. (२)
अगन्निन्द्र श्रवो बृहद् द्युम्नं दधिष्व दुष्टरम्. उत् ते शुष्मं तिरामसि.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारा अधिक अन्न हमें प्राप्त हो. तुम शत्रुओं के द्वारा प्राप्त न करने योग्य यश
अथवा धन को हमें प्राप्त कराओ. हम सोमरस अथवा स्तोत्र के द्वारा तुम्हारा बल बढ़ाते हैं.
(३)
अर्वावतो न आ गह्यथो शक्र परावतः.
उ लोको यस्ते अद्रिव इन्द्रेह तत आ गहि.. (४)
हे शतक्रतु इंद्र! तुम समीप और दूर देश से हमारे समीप आओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारा
जो भी लोक है, वहां से इस देव कर्म अर्थात् यज्ञ में सोमरस पीने के लिए आओ. (४)
इन्द्रो अङ्ग महद् भयमभी षदप चुच्यवत्. स हि स्थिरो विचर्षणिः.. (५)
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