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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 934 of 1063

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Page 934

उज्जायतां परशुर्ज्योतिषा सह भूया ऋतस्य सुदुघा पुराणवत्.
वि रोचतामरुषो भानुना शुचिः स्य १ र्ण शुक्रं शुशुचीत सत्पतिः.. (९)
मेघ को विदीर्ण करने के लिए इंद्र का वज्र अपने तेज के साथ प्रकट हो तथा जल का
दोहन करने वाली मध्यमा वाणी पहले के समान प्रकट हो तथा अपने तेज से प्रकाश वाली
हो. सूर्य देव जिस प्रकार अपने ही तेज से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार सज्जनों का पालन
करने वाले इंद्र अत्यधिक दीप्त हों. (९)
गोभिष्टरेमामतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्.
वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०)
हे बहुतों के द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम्हारी कृपा को प्राप्त करते हुए हम यजमान
तुम्हारे द्वारा दी गई गायों के कारण दरिद्रता को पार करें. तुम्हारे द्वारा दिए हुए अन्न से हम
अपने लोगों की भूख दूर करें. तुम्हारी कृपा से हम अपने समान जनों में श्रेष्ठ हों तथा राजा से
धन प्राप्त कर के अपने शत्रुओं को पराजित करें. (१०)
बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः.
इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु.. (११)
बृहस्पति देव पश्चिम दिशा से, ऊपर से एवं नीचे से अपने वाले हिंसक पापियों से हमारी
रक्षा करें. इंद्र देव सामने से तथा मध्य भाग से आते हुए हिंसक से हमारी रक्षा करें. इस प्रकार
चारों ओर से हमारी रक्षा करते हुए सखा रूप इंद्र हमें धन प्रदान करें. (११)
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य.
धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिदृयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१२)
हे बृहस्पति एवं इंद्र! तुम दोनों आकाश और धरती संबंधी धन के स्वामी हो. इसलिए
मुझ स्तोता को धन प्रदान करते हुए सदा रक्षा करो. (१२)
सूक्त—१८ देवता—इंद्र
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (१)
हे इंद्र! हम कण्व गोत्र वाले महर्षि सखा के समान तुम्हारी कामना करते हुए तुम से
संबंधित स्तोत्र से तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१)
न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्ठौ. तवेदु स्तोमं चिकेत.. (२)
हे वज्रधारी इंद्र! यज्ञरूपी नवीन कर्म की इच्छा पर हम इस समय तुम्हारे अतिरिक्त
किसी अन्य देव की स्तुति नहीं करते हैं. हम केवल तुम्हारी स्तुति को जानते हैं. (२)
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