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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 927

सोमरस के प्रेमी, वज्रधारी, कामनाओं की वर्षा करने वाले, शत्रुओं को पराजित करने
वाले, शत्रु पराभवकारी बदल से संपन्न, सभी देवों के स्वामी, वृत्र असुर का विनाश करने वाले
एवं नियम से सोमरस का पान करने वाले इंद्र अपने हरि नाम के घोड़ों को रथ में जोड़ कर
हमारे यज्ञ में आएं और इस माध्यंदिन यज्ञ में सोमपान कर के प्रसन्न हों. (७)
सूक्त—१३ देवता—इंद्र
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पते ऽस्मिन् यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू.
आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवो ऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्.. (१)
हे बृहस्पति देव! तुम और इंद्र इस यज्ञ में प्रसन्न होने वाले तथा धनों की वर्षा करने वाले
हो. तुम दोनों सोमरस का पान करो. उत्तम सोमरस ने तुम दोनों के शरीर में प्रवेश किया है.
तुम हमें सभी पुत्रों से युक्त धन प्रदान करो. (१)
आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुप्रत्वानः प्र जिगात बाहुभिः.
सीदता बर्हिरुरु वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः.. (२)
हे मरुतो! मंद गति वाले अश्व तुम्हें यज्ञशाला में लाएं. तुम भी शीघ्र गमन के साधनों
द्वारा यहां आओ. हम ने तुम्हारे बैठने के लिए यज्ञवेदी के रूप में विशाल स्थान बनाया है. उस
पर हम ने कुश बिछाए हैं. तुम उन कुशों पर बैठो. वहां बैठ कर तुम सोमरस पियो और प्रसन्न
होओ. (२)
इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया.
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (३)
रथकार जिस प्रकार रथ बनाता है, उसी प्रकार हम पूज्य अग्नि के लिए अपनी तीव्र
बुद्धि से बनाए गए स्तोत्र से अग्नि देव की पूजा करते हैं. अग्नि के निवास स्थान अर्थात्
यज्ञशालाओं में हमारी उत्तम बुद्धि कल्याणकारिणी हो. हे अग्नि देव! तुम्हारे बंधुभाव को
प्राप्त कर के हम किसी के द्वारा पराजित न हों. (३)
ऐभिरग्ने सरथं याह्यर्वाङ् नानारथं वा विभवो ह्यश्वाः.
पत्नीवतस्त्रिंशतं त्रींश्च देवाननुष्वधमा वह मादयस्व.. (४)
हे अग्नि! तुम तैंतीस देवताओं के साथ एक रथ पर बैठ कर हमारे यज्ञ में आओ. तुम
चाहो तो अनेक रथों में बैठ कर आओ. तुम्हारे अश्व अत्यधिक शक्तिशाली हैं. इसलिए तुम
जबजब सोमरस पान के लिए बुलाए जाओ, तबतब उन देवों को पत्नियों सहित यहां लाओ
और सोमपान से उन्हें आनंदित करो. (४)
सूक्त—१४ देवता—इंद्र
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