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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 924 of 1063

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Page 924

हे इंद्र! मैं तुम्हारे प्रशंसनीय बल को बढ़ाने वाली स्तुतिरूपी वाणी को प्रेरित करता हूं. मैं
अन्न प्राप्ति के लिए तुम्हें अलंकृत करता हूं. हे इंद्र! तुम मनुष्य संबंधी और देव संबंधी
प्रजाओं के आगे चलने वाले हो. (२)
इन्द्रो वृत्रमवृणोच्छर्धनीतिः प्र मायिनाममिनाद् वर्पणीतिः
अहन् व्यं समुशधग् वनेष्वाविर्धेना अकृणोद् रम्याणाम्.. (३)
अपने हिंसक बल का शत्रु पर प्रयोग करने वाले इंद्र देव ने सभी ओर से व्याप्त करने
वाले वृत्र को रोका और अपने शस्त्र से मायावी शत्रु का विनाश किया. इंद्र ने वृत्र असुर को
भुजाओं से हीन कर के मारा. इस के बाद उस के रमण के साधनों — पत्नी अथवा गौ आदि
को अपने अधिकार में किया. (३)
इन्द्रः स्वर्षा जनयन्नहानि जिगायोशिग्भिः पृतना अभिष्टिः.
प्रारोचयन्मनवे केतुमह्नामविन्दज्ज्योतिर्बृहते रणाय.. (४)
इंद्र स्वर्ग प्राप्त कराने वाले तथा शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं. इंद्र अंधकार का
विनाश कर के दिनों को जन्म देते हैं. इंद्र ने असुरों के साथ युद्ध कर के उन की सेनाओं को
जीता है. इंद्र ने यजमानों के अधिक सुख के लिए दिन के स्वामी सूर्य को आकाश में दीप्त
किया और उस से महान तेज प्राप्त किया है. (४)
इन्द्रस्तुजो बर्हणा आ विवेश नृवद् दधानो नर्या पुरूणि.
अचेतयद् धिय इमा जरित्रे प्रेमं वर्णमतिरच्छुक्रमासाम्.. (५)
जैसे युद्ध का इच्छुक वीर शत्रु सेना में प्रवेश करता है, उसी प्रकार इंद्र भी यजमानों के
हित के लिए असुरों की विशाल सेनाओं में प्रवेश करते हैं तथा स्तुति करने वालों के लिए
उषाओं का उदय करते हैं. इंद्र ही उषाओं के श्वेत रंग को बढ़ाते हैं. (५)
महो महानि पनयन्त्यस्येन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरूणि.
वृजनेन वृजिनान्त्सं पिपेष मायाभिर्दस्यूँरभिभूत्योजाः.. (६)
इंद्र ने जो अनेक प्रशंसनीय कार्य किए हैं, श्रोता उन की प्रशंसा करते हैं. शत्रुओं को वश
में करने वाले इंद्र ने पापी राक्षसों को अपने अस्त्रों से नष्ट कर दिया है तथा शक्तिशाली असुरों
का विनाश कर दिया. (६)
युधेन्द्रो मह्ना वरिवश्चकार देवेभ्यः सत्पतिश्चर्षणिप्राः.
विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति.. (७)
किसी की सहायता न ले कर इंद्र ने अकेले ही अपने स्तुतिकर्ताओं को धन प्राप्त
कराया. इंद्र यजमानों की सदा रक्षा करते हैं और मनुष्यों को इच्छित फल देते हैं. यज्ञ आदि
कर्म करने वाले मनुष्य इंद्र का वरण करते हैं. (७)
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