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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 921

समीप आओ और आ कर हमारी इन स्तुतियों को स्वीकार करो. (८)
यदन्तरा परावतमर्वावतं च हूयसे. इन्द्रेह तत आ गहि.. (९)
हे इंद्र! तुम दूर देश में अथवा समीपवर्ती देश में जहां भी हो. वहां से बुलाए जा रहे हो.
हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में शीघ्र आओ. (९)
सूक्त—७ देवता—इंद्र
उद् घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम्. अस्तारमेषि सूर्य.. (१)
हे सूर्य! यज्ञ करने वालों अथवा स्तुति करने वालों के लिए इंद्र के द्वारा धन दिया जाना
प्रसिद्ध है. इंद्र अभीष्ट फलों की वर्षा करने वाले हैं. उन के कर्म मनुष्यों के लिए हितकारी हैं.
अनिष्टों को दूर करने तथा शत्रुओं को दबाने के कार्य को ध्यान में रख कर तुम उदित होते हो.
(१)
नव यो नवतिं पुरो बिभेद बाह्वो जसा. अहिं च वृत्रहावधीत्.. (२)
जिन इंद्र ने शंबर असुर की माया के लिए निन्यानवे नगरों को अपने बाहुबल से तोड़
डाला था, उन्हीं इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था. (२)
स न इन्द्रः शिवः सखाश्वावद् गोमद् यवमत्. उरुधारेव दोहते. (३)
इंद्र हमारे लिए कल्याणकारी तथा हमारे मित्र हैं. वे हमें घोड़े, गाएं और जौ नाम का
अन्न प्रदान करें. इंद्र अधिक दूध देने वाली गाय के समान धन देते हैं. (३)
इन्द्र क्रतुविदं सुतं सोमं हर्य पुरुष्टुत. पिबा वृषस्व तात्पिम्.. (४)
हे बहुतों के द्वारा प्रशंसित इंद्र! यज्ञ के साधक और निचोड़े गए सोम को पीने की इच्छा
करो. तुम इस सोम को अपने उदर में भर लो. (४)
सूक्त—८ देवता—इंद्र
एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृध्वस्वोत गीर्भिः.
आविः सूर्यं कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि.. (१)
हे इंद्र! तुम ने जिस प्रकार प्राचीन काल में अंगिरा आदि ऋषियों के यज्ञों में सोमपान
किया था, उसी प्रकार हमारे इस यज्ञ में भी करो. पिया हुआ सोम तुम्हें प्रसन्न करे. तुम हमारे
मंत्र रूप स्तोत्रों को सुनो. तुम हमारी स्तुतियों के द्वारा वृद्धि को प्राप्त करो. तुम सूर्य को
प्रकाशित करो. तुम अन्नों को हमारे उपभोग का साधन बनाओ तथा हमारे शत्रुओं का विनाश
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