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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 910 of 1063

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Page 910

घृतस्य जूतिः समना सदेवा संवत्सरं हविषा वर्धयन्ती.
श्रोत्रं चक्षुः प्राणो ऽ च्छिन्नो नो अस्त्वच्छिन्ना वयमायुषो वर्चसः.. (१)
परमात्मा के स्वरूप के विषय में जो ज्ञान है, वह सभी प्राणियों के हृदयों तथा सभी
प्राणियों की इंद्रियों में स्थित है. परमात्मा से संबंधित ज्ञान परमात्मा को हवि के द्वारा बढ़ाता
हुआ हमारे कानों और आंखों को स्वस्थ करे. हम जीवन के तेज से युक्त रहें. (१)
उपास्मान् प्राणो ह्वयतामुप वयं प्राणं हवामहे.
वर्चो जग्राह पृथिव्य १ न्तरिक्षं वर्चः सोमो बृहस्पतिर्विधत्ता.. (२)
शरीर को धारण करने वाली प्राण वायु मानस यज्ञ करने वाले हम को दीर्घ जीवन की
अनुमति प्रदान करे. हम प्राण वायु को अपने शरीर में चिरकाल तक स्थित रहने के लिए
बुलाते हैं. पृथ्वी और अंतरिक्ष ने हमें देने के लिए ही तेज ग्रहण किया है. हे सोम! बृहस्पति
एवं अग्नि अथवा सूर्य हमें देने के लिए तेज ग्रहण करें. (२)
वर्चसो द्यावापृथिवी संग्रहणी बभूवभुर्वर्चो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम.
यशसं गावो गोपतिमुप तिष्ठन्त्यायतीर्यशो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम..
(३)
हे आकाश और पृथ्वी! तुम हमें तेज प्रदान करने वाली बनो. हम तेज ग्रहण कर के
पृथ्वी पर संचरण करें. गायों के स्वामी मेरे अधिकार में अन्न और गाएं स्थित हैं. हम आती हुई
गायों को ग्रहण कर के पृथ्वी पर संचरण करें. (३)
व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्मा सीव्यध्वं बहुला पृथूनि.
पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (४)
हे इंद्रियो! तुम शरीर में स्थान बनाओ, क्योंकि यह शरीर अपनेअपने विषयों में तुम्हारा
रक्षक है. तुम अपने विस्तृत विषयों को अधिकार में करो. यह शरीर तुम्हारा चमस अर्थात्
तुम्हारे भोग का साधन है. इस का विनाश न हो. तुम इस शरीर को दृढ़ करो. (४)
यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि.
इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः.. (५)
चक्षु आदि इंद्रियों को मैं मानस यज्ञ में हवन करता हूं. यह यज्ञ विश्वकर्मा देव ने विस्तृत
किया है. उत्तम हृदय वाले देव इस मानस यज्ञ को प्राप्त करें. (५)
ये देवानामृत्विजो ये च यज्ञिया येभ्यो हव्यं क्रियते भागधेयम्.
इमं यज्ञं सह पत्नीभिरेत्य यावन्तो देवास्तविषा मादयन्ताम्.. (६)
देवताओं में जो समय-समय पर यज्ञ करने वाले अर्थात् ऋत्विज् हैं तथा जो यज्ञ के
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