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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 908 of 1063

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Page 908

बृहद्गावासुरेभ्यो ऽ धि देवानुपावर्तत महिमानमिच्छन्.
तस्मै स्वप्नाय दधुराधिपत्यं त्रयस्त्रिंशासः स्व रानशाना.. (३)
सब को व्याप्त करने वाला स्वप्न असुरों के पास से चल कर देवों को प्राप्त हुआ था.
स्वप्न देवों के पास महत्त्व प्राप्त करने के लिए गया था. तैंतीस देवताओं ने उस स्वप्न को
अनिष्ट करने की शक्ति प्रदान की. (३)
नैतां विदुः पितरो नोत देवा येषां जल्लिश्वरत्यन्तरेदम्.
त्रिते स्वप्नमदधुराप्त्ये नर आदित्यासो वरुणेनानुशिष्टाः.. (४)
देवों के द्वारा स्वप्न को जो अनिष्ट कारक शक्ति प्रदान की गई थी, उसे न पिता जानते हैं
और न देव जानते हैं. आदित्यों ने दुःस्वप्न से बचने का उपाय वरुण से पूछा. वरुण ने
आदित्यों को स्वप्न से बचने का उपाय बताया. आदित्यों ने जलों के पुत्र मित्र नामक ऋषि पर
अनिष्ट फल सूचक स्वप्न को स्थापित कर दिया. (४)
यस्य क्रूरमभजन्त दुष्कृतो ऽ स्वप्नेन सुकृतः पुण्यमायुः.
स्वर्मदसि परमेण बन्धुना तप्यमानस्य मनसो ऽ धि जज्ञिषे.. (५)
पापी पुरुष उस दुःस्वप्न का भयंकर फल प्राप्त करते हैं. उत्तम कर्म करने वाले दुःस्वप्न न
देख कर पुण्य कर्म करने के लिए आयु प्राप्त करते हैं. हे बुरे स्वप्न! तुम स्वर्गलोक में सर्वश्रेष्ठ
विधाता के साथ प्रसन्न रहते हो तथा मृत्यु के पास से संतप्त बुरे कर्म करने वाले पुरुष के मन
में मृत्यु की सूचना देने के लिए उत्पन्न होते हो. (५)
विद्म ते सर्वाः परिजाः पुरस्ताद् विद्म स्वप्न यो अधिपा इहा ते.
यशस्विनो नो यशसेह पाह्याराद् द्विषेभिरप याहि दूरम्.. (६)
हे स्वप्न! हम तेरे सभी परिजनों को जानते हैं तथा इस समय तेरा जो स्वामी है, उसे भी
जानते हैं. तेरे परिजनों तथा स्वामी को जानने वाले हम यशस्वीजनों की इस प्रसंग में यज्ञ
अथवा अन्न के लिए रक्षा करो. जो लोग हम से द्वेष करते हैं, तुम उन के साथ दूर देश में चले
जाओ. (६)
सूक्त—५७ देवता—दुःस्वप्ननाशन
यथा कलां यथा शफं यथर्णं संनयन्ति.
एवा दुष्ष्वप्न्यं सर्वमप्रिये सं नयामसि.. (१)
जैसे ऋत्विज् मारे गए बलि पशु को काट कर टुकड़े योग्य अंगों का संस्कार करते हुए
खुर आदि प्रयोग में न आने वाले अंगों को साथ ले कर अन्यत्र जाते हैं तथा जिस प्रकार ऋण
देने वाले को मूल धन और ब्याज लौटाते हैं, उसी प्रकार बुरे स्वप्न के कारण जितने भी अनर्थ