अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 885 of 1063
Read in contextअग्नि देव के द्वारा दी हुई यह दीप्ति आए. तेज एवं यश के साथ ओज, यौवन और बल
आए. तैंतीस प्रकार के जो कार्य अर्थात् वीरतापूर्ण सामर्थ्य हैं, अग्नि उन्हें मुझे प्रदान करें. (१)
वर्च आ धेहि मे तन्वां ३ सह ओजो वयो बलम्.
इन्द्रियाय त्वा कर्मणे वीर्याय प्रति गृह्णामि शतशारदाय.. (२)
हे अग्नि! मेरे शरीर में शत्रुओं को पराजित करने वाला तेज हो तथा तेज के साथ मुझे
पूर्ण आयु और बल प्रदान करो. मैं ज्ञानेंद्रियों तथा कर्मेंद्रियों की दृढ़ता के लिए तुझे स्वीकार
करता हूं. मैं अग्निहोत्र आदि कर्म के लिए वायु पर विजय प्राप्त करने वाले कार्य के लिए तथा
सौ वर्ष का जीवन प्राप्त करने के लिए तुझे ग्रहण करता हूं. (२)
ऊर्जे त्वा बलाय त्वौजसे सहसे त्वा.
अभिभूयाय त्वा राष्ट्रभृत्याय पर्यूहामि शतशारदाय.. (३)
हे स्वीकार किए गए पदार्थ! मैं तुम्हें अन्न प्राप्ति के लिए, बल प्राप्ति के लिए, तेज प्राप्ति
के लिए, धन प्राप्ति के लिए, शत्रु जय के लिए तथा राज्य के भरणपोषण के लिए सौ वर्षों की
अवधि हेतु ग्रहण करता हूं. (३)
ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः.
धात्रे विधात्रे समृधे भूतस्य पतये यजे.. (४)
हे पदार्थ! मैं तुझे ग्रीष्म आदि ऋतुओं को प्रसन्न करने के लिए, ऋतु संबंधी देवताओं
को प्रसन्न करने के लिए, चैत्र आदि मासों को प्रसन्न करने के लिए, संवत्सरों को प्रसन्न करने
के लिए, धाता और विधाता तथा सभी प्राणियों के स्वामी समृध को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ
करता हूं. (४)
सूक्त-३८ देवता—गुग्गुलु
न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते.
यं भेषजस्य गुल्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते.. (१)
उस राजा को यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. नाम का रोग पीड़ित नहीं करता और दूसरों के द्वारा
अभिशाप उस पर प्रभाव डालता है, जिस राजा को गूगल नाम की ओषध की सुखदायक गंध
व्याप्त करती है. (१)
विष्वञ्चस्तस्माद् यक्ष्मा मृगा अश्वा इवेरते.
यद् गुल्गुलु सैन्धवं यद् वाप्यासि समुद्रियम्.. (२)
गूगल की गंध सूंघने वाली यह यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. नाम की व्याधि हिरन और घोड़े के
समान सभी दिशाओं में तीव्र गति से भागती है. गुग्गुल या तो सिंधु देश में उत्पन्न हो अथवा
ebook converter DEMO Watermarks*