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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 839 of 1063

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Page 839

आकूतया नो बृहस्पत आकूतया न उपा गहि.
अथो भगस्य नो धेह्यथो नः सुहवो भव.. (३)
हे बृहस्पति! तुम सब देवों के पालनकर्ता हो. तुम सभी को देने के लिए आओ. तुम
सरस्वती को हमारे अनुकूल करने के लिए आओ. तुम हमें सौभाग्य प्रदान करो. तुम हमारे
आह्वान मात्र से हमारे अनुकूल बनो. (३)
बृहस्पतिर्म आकूतिमाङ्गिरसः प्रति जानातु वाचमेताम्.
यस्य देवा देवताः संबभूवुः स सुप्रणीताः कामो अन्वेत्वस्मान्.. (४)
अंगिराओं के पुत्र बृहस्पति देव सब वाक्यों की रूपा सरस्वती को मुझे देने के लिए
स्मरण करें. स्त्री-पुरुष रूप सभी देवता जिस बृहस्पति के वश में है और सभी देवता जिस
बृहस्पति के द्वारा कार्यों में लगाए गए हैं, वे बृहस्पति देव हम कामना करने वालों को फल देने
के लिए आएं. (४)
सूक्त-५ देवता—इंद्र
इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमि विषुरूपं यदस्ति.
ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद् राध उपस्तुतश्चिदर्वाक्.. (१)
तीनों लोकों में निवास करने वाले मनुष्यों एवं देवताओं के स्वामी इंद्र हवि देने वाले
यजमान को धन ला कर दें. धरती पर जो अनेक रूपों वाला धन है, उसे मुझे प्रदान करें.
स्तुति किए गए इंद्र धनों को हमारे सामने प्रेरित करें, हमें प्रदान करें. (१)
सूक्त-६ देवता—पुरुष
सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्.. (१)
अनंत भुजाओं, अनंत नेत्रों और अनंत चरणों वाले यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले
नारायण नाम के पुरुष हैं, वे सात समुद्रों और सात द्वीपों वाली भूमि को अपनी महिमा से
सभी ओर से व्यक्त कर के दश अंगुल वाले हृदय रूप आकाश में स्थित हुए. (१)
त्रिभिः पद्भिर्द्यामरोहत् पादस्येहाभवत् पुनः.
तथा व्य क्रामद् विष्वङशनानशने अनु.. (२)
यज्ञ के अनुष्ठाता वे नारायण नाम के पुरुष अपने तीन चरणों से स्वर्गलोक पर आरूढ़
हुए. उन का चौथा चरण इस भूलोक में बारबार प्रकट होता है. यह चौथा चरण भोजन करने
वाले मनुष्य, पशु आदि और भोजन न करने वाले देव, वृक्ष आदि सभी में व्याप्त है. (२)
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