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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 819 of 1063

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Page 819

विवस्वान् अर्थात् सूर्य हमें अमृतत्व में धारण करें अर्थात् हमें मृत्यु रहित बनाएं. उस के
प्रभाव से मृत्यु मुझ से विमुख हो जाए. हम को मरणहीनता प्राप्त हो. सूर्य देव हमारे पुत्रों
और पौत्रों का वृद्धावस्था तक पालन करें. इन पुरुषों के पुत्र विवस्वान के पुत्र यम के पास न
जाएं. (६२)
यो दध्रे अन्तरिक्षे न मह्ना पितॄणां कविः प्रमतिर्मतीनाम्.
तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः स नो यमः प्रतरं जीवसे धात्.. (६३)
क्रांतदर्शी एवं उत्तम बुद्धि वाले यम अपनी महिमा से स्तोताओं और पितरों को अंतरिक्ष
में धारण करते हैं. हे ब्राह्मणो! तुम सभी प्राणियों के मित्र हो. तुम हवि आदि से यम की पूजा
करो. वे यम हमारा जीवन पुष्ट बनाएं. (६३)
आ रोहत दिवमुत्तमामृषयो मा बिभीतन.
सोमपाः सोमपायिन इदं वः क्रियते हविरगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (६४)
हे मंत्रदर्शी मनुष्यो! तुम उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करो. तुम भय मत करो. मंत्र दर्शी ऋषियों
ने स्वयं सोमरस को पिया है तथा दूसरों को सोमरस का पान कराया है. स्वर्ग में आरूढ़
तुम्हारे निमित्त यह हवि संपन्न की गई है. इस से तुम चिरकाल का जीवन प्राप्त करो. (६४)
प्र केतुना बृहता भात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति.
दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (६५)
यह अग्नि देव धूम रूपी महान अंडे के द्वारा बहुत दीप्त होते हैं. स्वर्ग और पृथ्वीवासियों
की कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि महान शब्द करते हैं. ये अग्नि आकाश से भी ऊपर
व्याप्त होते हैं. उस के बाद जलों के प्रदेश में महान हो कर वृद्धि प्राप्त करते हैं. (६५)
नाके सुपर्णमुप यत् पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा.
हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरुण्युम्.. (६६)
हे प्रेत! हम जब तुम्हें उत्तम गति से स्वर्ग की ओर जाता हुआ देखते हैं, तब तुम्हें
स्वर्णिम पंखों वाले वरुण के दूत यमराज के घर में पक्षी के समान तथा भरण करने वाले के
रूप में देखते हैं. (६६)
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा.
शिक्षा णो अस्मिन् पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (६७)
हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव! हमें सोमयाग लक्षण कर्म अथवा उस से संबंधित ज्ञान इस
प्रकार प्रदान करो, जिस प्रकार पिता पुत्रों के लिए उन के मनचाहे फल लाता है. हे पुरुहूत!
हमें संसार गमन की शिक्षा दो अथवा हमें मनचाहा फल प्रदान करो. हम तुम्हारी कृपा से
चिरकाल के जीवन से युक्त हों और इस लोक के सुख का अनुभव करें. (६७)
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