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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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उसी प्रकार मैं इस के भ्रातृत्व से अलग होती हुई इस से मिल जाऊं. (१०)
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि.
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्.. (११)
यम—संभव है, आगे चल कर ऐसे ही दिन और रात आएं, जब बहन अपने बंधु भाव
को छोड़ कर पत्नी का रूप प्राप्त करने लगेगी. पर अभी ऐसा नहीं हो रहा है. इसलिए हे
यमी! तू स्त्री में गर्भ धारण करने में समर्थ किसी अन्य पुरुष की ओर अपना हाथ बढ़ा और
मुझे छोड़ कर उसी को अपना पति बनाने की इच्छा कर. (११)
किं भ्रातासद् यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निॠतिर्निगच्छात्.
काममूता बह्वे ३ तद् रपामि तन्वा मे तन्वं १ सं पिपृग्धि.. (१२)
यमी—वह भाई कैसा है, जिस के विद्यमान रहते हुए उस की बहन अपनी चाही हुई
कामना से हीन रह जाए. वह कैसी बहन है, जिस के सामने ही उस का भाई काम संतप्त हो.
इसी कारण तुम मेरी इच्छा के अनुसार आचरण करो. (१२)
न ते नाथं यम्यत्राहमस्मि न ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्याम्.
अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत्.. (१३)
यम—हे यमी! मैं तेरी इस कामना को पूर्ण करने वाला नहीं हो सकता. मैं तेरी देह को
स्पर्श नहीं कर सकता. इसलिए तू अब मुझे छोड़ कर किसी अन्य पुरुष से इस प्रकार का
संबंध स्थापित कर. मैं तुझे पत्नी बनाने की कामना नहीं करता हूं. (१३)
न वा उ ते तनूं तन्वा ३ सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्.
असंयदेतन्मनसो हृदो मे भ्राता स्वसुः शयने यच्छयीय.. (१४)
यम—हे यमी! मैं तेरे शरीर का स्पर्श नहीं कर सकता. धर्म के जानने वाले भाई और
बहन के ऐसे संबंध को पाप कहते हैं. यदि मैं ऐसा करूं तो यह कर्म मेरे हृदय, मन और प्राण
का नाश कर देगा. (१४)
बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम.
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्.. (१५)
यमी—हे यम! तेरी दुर्बलता पर मैं दुखी हूं. तेरा मन मुझ में नहीं लगा है. मैं अभी तक
तेरे मन को नहीं समझ सकी. तू किसी अन्य स्त्री से संबंधित होगा. (१५)
अन्यम् षु यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजातै लिबुजेव वृक्षम्.
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम्.. (१६)
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