अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतू ऋषियों का पाषाण है. तुझ देवरूप पाषाण को मैं नमस्कार करता हूं. (६)
सूक्त-३ देवता—आदित्य
मूर्धाहं रयीणां मूर्धा समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों का शीर्ष रूप रहूं. जो व्यक्ति मेरे समान हैं, उन में मैं मस्तक के समान उच्च रहूं.
(१)
रुजश्च मा वेनश्च मा हासिष्टां मूर्धा च मा विधर्मा च मा हासिष्टाम्.. (२)
रज, यज्ञ, मूर्धा अर्थात् शीश और विशेष धर्म मेरा त्याग न करें. (२)
उर्वश्च मा चमसश्च मा हासिष्टां धर्ता च मा धरुणश्च मा हासिष्टाम्.. (३)
उर्व अर्थात् पकाने वाला पात्र, चमस अर्थात् चमचा धारण करने वाले और आधार मुझ
से अलग न हों. (३)
विमोकश्च मार्द्रपविश्च मा हासिष्टामार्द्रदानुश्च मा मातरिश्वा च मा
हासिष्टाम्.. (४)
मुक्त करने वाला तथा गीला आयुध, आर्द्रदानु और मातरिश्वा अर्थात् पवन मुझ से
अलग न हो. (४)
बृहस्पतिर्म आत्मा नृमणा नाम हृद्यः.. (५)
हर्ष देने वाले, अनुग्रह करने वाले तथा मन को लगाने वाले बृहस्पति मेरी आत्मा हैं. (५)
असंतापं मे हृदयमुत्रीं गव्यूतिः समुद्रो अस्मि विधर्मणा.. (६)
दो कोस तक की भूमि मेरे अधिकार में हो. मेरा हृदय कभी संतप्त न रहे. मैं धारण
करने की शक्ति के द्वारा सागर के समान गंभीर बनूं. (६)
सूक्त-४ देवता—आदित्य
नाभिरहं रयीणां नाभिः समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों की नाभि के समान बनूं. जो पुरुष मेरे समान हैं, उन में भी मैं नाभि रूप बनूं.
(१)
स्वासदसि सूषा अमृतो मर्त्येष्विा.. (२)
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