अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextभोजन परोसना आदि कार्य करे. (१३)
तस्यामेवास्य तद् देवतायां हुतं भवति य एवं वेद.. (१४)
जो इस बात को जानता है, उस की आहुति देवताओं के लिए दी जाने पर उत्तम आहुति
बन जाती है. (१४)
सूक्त-१४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स यत् प्राचीं दिशमनु व्यचलन्मारुतं शर्धो भूत्वानुव्य चलन्मनो ऽ न्नादं
कृत्वा.. (१)
जब वह पूर्व दिशा की ओर चला, तब उस ने बलशाली हो कर अपनी आयु के अनुकूल
आचरण करते हुए अपने मन को अन्नाद अर्थात् अन्न खाने वाला बनाया. (१)
मनसान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (२)
जो मनुष्य इस बात को जानता है, वह अन्नाद मन से अन्न को खाता है. (२)
स यद् दक्षिणां दिशमनु व्यचलदिन्द्रो भूत्वानुव्य चलद् बलमन्नादं कृत्वा..
(३)
जब वह दक्षिण दिशा की ओर गया, तब वह अपने बल को अन्नाद बताता हुआ इंद्र बन
कर गमनशील हुआ. (३)
बलेनान्नादेनान्नमत्ति य एवं वेद.. (४)
इस बात को जानने वाला अन्नाद बल से अन्न का सेवन करता है. (४)
स यत् प्रतीचीं दिशमनु व्यचलद् वरुणो राजा भूत्वानुव्य चलदपो ऽ न्नादी:
कृत्वा.. (५)
जब वह पश्चिम दिशा की ओर चला, तब वह जल को अन्नाद बताता हुआ वरुण बन
कर गतिशील हुआ. (५)
अद्भिरन्नादिभिरन्नमत्ति य एवं वेद.. (६)
इस बात को जानने वाला अन्नाद जल से अन्न का भक्षण करता है. (६)
स यदुदीचीं दिशमनु व्यचलत् सोमो राजा भूत्वानुव्य चलत् सप्तर्षिभिर्हुत आहुतिमन्नादीं
कृत्वा.. (७)
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