अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य. शोचिष्केशं विचक्षणम्.. (२३)
हे सूर्य देव! तेजस्वी रश्मियों वाले रथ से जुड़े हुए हरे रंग के सात घोड़े तुम को वहन
करते हैं. (२३)
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्यः. ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः.. (२४)
सूर्य सब को पवित्र करने वाले सात घोड़ों को अपने रथ में जोड़ते हैं तथा उन के सहारे
अपनी युक्तियों से गमन करते हैं. (२४)
रोहितो दिवमारुहत् तपसा तपस्वी.
स योनिमैति स उ जायते पुनः स देवानामधिपतिर्बभूव.. (२५)
सूर्य अपने तेज के सहारे स्वर्ग पर चढ़ते हैं. इस प्रकार उदय को प्राप्त होते हुए सूर्य
अन्य सभी देवों के स्वामी हो गए हैं. (२५)
यो विश्वचर्षशणिरुत विश्वतोमुखो यो विश्वतस्पाणिरुत विश्वतस्पृथः.
सं बाहुभ्यां भरति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः.. (२६)
अनेक सुखों वाले, सब को देखने वाले और सभी ओर किरणें फैलाने वाले सूर्य अपनी
नीचे की ओर आती हुई किरणों के द्वारा आकाश और पृथ्वी को प्रकट करते हुए अपनी
भुजाओं से सब का भरणपोषण करते हैं. (२६)
एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्.
द्विपाद्व षट्पदो भूयो वि चक्रमे त एकपदस्तन्वं १ समासत.. (२७)
सूर्य देव एक चरण वाले होने पर भी अनेक चरणों वालों से आगे बढ़ जाते हैं. अनेक
चरणों वाले अनेक प्राणी इस एक चरण वाले सूर्य के आश्रय में रहते हैं. (२७)
अतन्द्रो यास्यन् हरितो यदास्थाद् द्वे रूपे कृणुते रोचमानः.
केतुमानुद्यन्सहमानो रजांसि विश्वा आदित्य प्रवतो वि भासि.. (२८)
अज्ञान से रहित सूर्य चलते हुए जब विश्राम करते हैं, तब अपने दो रूप बनाते हैं. हे सूर्य
देव! तुम उदय हो कर सभी लोकों को वश में करते हुए उन्हें प्रकाशित करते हो. (२८)
बण्महाँ असि सूर्य बडादित्य महाँ असि.
महांस्ते महतो महिमा त्वमादित्य महाँ असि.. (२९)
हे सूर्य देव! यह सत्य है कि तुम महान हो और तुम्हारी महिमा भी महती है. (२९)
रोचसे दिवि रोचसे अन्तरिक्षे पतङ्ग पृथिव्यां रोचसे रोचसे अपस्व १ न्तः.