अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअग्ने सपत्नानधरान् पादयास्मद् व्यथया सजातमुत्पिपानं बृहस्पते.
इन्द्राग्नी मित्रावरुणावधरे पद्यन्तामप्रतिमन्यूमानाः.. (३१)
हे अग्नि! तुम हमारे शत्रुओं को पतित बनाओ. हे बृहस्पति! तुम उन्नतिशील होते हुए
हमारे शत्रुओं का संतप्त करो. इंद्र, अग्नि, मित्र और वरुण देवता हमारे शत्रुओं का विरोध
करें. हमारे शत्रु पतित हो जाएं. (३१)
उद्यंस्त्वं देव सूर्य सपत्नानव मे जहि.
अवैनानश्मना जहि ते यन्त्वधमं तमः.. (३२)
हे उदय होते हुए सूर्य! तुम मेरे शत्रुओं का वध करो. तुम इन्हें पत्थरों से मार डालो. मेरे
शत्रु मृत्यु के समान घोर अंधकार को प्राप्त हों. (३२)
वत्सो विराज वृषभो मतीनामा रुरोह शुक्रपृष्ठो ऽ न्तरिक्षम्.
घृतेनार्कमभ्यर्चन्ति वत्सं ब्रह्म सन्तं ब्रह्मणा वर्धयन्ति.. (३३)
विराट् के वत्स सूर्य अंतरिक्ष अर्थात् आकाश पर चढ़ते हैं. सूर्य रूप वत्स जब ब्रह्म हो
जाते हैं, तभी वे ब्राह्मण उन्हें घृत से बढ़ाते हैं और मंत्रों के द्वारा उन की पूजा करते हैं. (३३)
दिवं च रोह पृथिवीं च रोह राष्ट्रं च रोह द्रविणं च रोह.
प्रजां च रोहामृतं च रोह रोहितेन तन्वं १ सं स्पृशस्व.. (३४)
हे राजन्! तुम पृथ्वी पर अधिष्ठित रहो. तुम राष्ट्र और धन पर अधिष्ठित रहो. तुम छत्र के
समान प्रजाओं पर छाया करते रहो. तुम अमृत पर अधिष्ठित होते हुए सूर्य का स्पर्श करने
वाले बनो तथा स्वर्ग पर आरोहण करो. (३४)
ये देवा राष्ट्रभृतो ऽ भितो यन्ति सूर्यम्.
तैष्टे रोहितः संविदानो राष्ट्रं दधातु सुमनस्यमानः.. (३५)
राष्ट्र का भरणपोषण करने वाले जो देवता सूर्य के चारों ओर घूमते हैं, रोहितदेव उन से
समान मति रखते हुए तुम्हारे राष्ट्र को संतुष्ट करें. (३५)
उत् त्वा यज्ञा ब्रह्मपूता वहन्त्यध्वगतो हरयस्त्वा वहन्ति.
तिरः समुद्रमति रोचसे ऽ र्णवम्.. (३६)
हे सूर्य! मंत्र के द्वारा ये यज्ञ तुम्हें वहन करते हैं. तुम तिरछे हो कर सागर को अत्यधिक
शोभायमान करते हो. (३६)
रोहिते द्यावापृथिवी अधि श्रिते वसुजिति गोजिति संधनाजिति.
सहस्रं यस्य जनिमानि सप्त च वोचेयं ते नाभिं भुवनस्याधि मज्जनि..
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