Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 683 of 1063

Read in context
Page 683

सहस्रशृङ्गो वृषभो जातवेदा घृताहुतः सोमपृष्ठः सुवीरः.
मा मा हासीन्नाथितो नेत् त्वा जहानि गोपोषं च मे वीरपोषं च धेहि.. (१२)
सहस्रों सींगों वाले, घृत के द्वारा बुलाए गए, इष्टों की पूर्ति करने वाले, सोम, पृष्ठ, सुवीर
तथा जातवेद अग्नि मेरा त्याग न करें. वे अग्नि मुझे गायों तथा पुत्र, पौत्र आदि की पुष्टि में
प्रतिष्ठित करें. (१२)
रोहितो यज्ञस्य जनिता मुखं च रोहिताय वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि.
रोहितं देवा यन्ति सुमनस्यमानाः स मा रोहैः सामित्यै रोहयतु.. (१३)
सूर्य यज्ञ को प्रकट करने वाले तथा यज्ञ के मुख रूप हैं. वाणी, घोष और मन से मैं उन
सूर्य के लिए आहुति देता हूं. सब देवता प्रसन्न होते हुए सूर्य के समीप जाते हैं. वे सूर्य मुझे
संग्राम के लिए उन्नत बनाएं. (१३)
रोहितो यज्ञं व्य दधाद् विश्वकर्मणे तस्मात् तेजांस्युप मेमान्यागुः.
वोचेयं ते नाभिं भुवनस्याधि मज्मानि.. (१४)
सूर्य ने विश्वकर्मा के लिए यज्ञ का पोषण किया. उस यज्ञ के द्वारा मुझे वह तेज प्राप्त हो
रहा है. मैं तुम्हारी नाभि को लोक की मज्जा पर स्वीकार करता हूं. (१४)
आ त्वा रुरोह बृहत्यू ३ त पङ्क्तिरा ककुब् वर्चसा जातवेदः.
आ त्वा रुरोहोष्णिहाक्षरो वषट्कार आ त्वा रुरोह रोहितो रेतसा सह..
(१५)
हे अग्नि! बृहती पंक्ति और ककुप छंदों ने तथा उष्णिहा अक्षरों ने तुम में प्रवेश किया है.
वषट्कार भी तुम में प्रविष्ट हो गया है. सूर्य भी अपने तेज से तुम में प्रवेश करते हैं. (१५)
अयं वस्ते गर्भं पृथिव्या दिवं वस्ते ऽ यमन्तरिक्षम्.
अयं ब्रध्नस्य विष्टपि स्वर्लोकान् व्यानशे.. (१६)
सूर्य पृथ्वी के गर्भ को, आकाश और अंतरिक्ष को भी ढक लेते हैं. ये संपूर्ण संसार के
प्रकाशक हैं और सभी स्वर्गों में व्याप्त होते हैं. (१६)
वाचस्पते पृथिवी नः स्योना स्योना योनितल्पा नः सुशेवा.
इहैव प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्वा परमेष्ठिन् पर्यग्निरायुषा वर्चसा दधातु..
(१७)
हे वाचस्पति! हमारे लिए पृथ्वी, योनि और शय्या सुख देने वाली हों. प्राण हमारे लिए
सुख देने वाला हो. हम दीर्घ जीवी हों हे परमेष्ठी! ये अग्नि देव हमें दीर्घायु और तेजस्वी
बनाएं. (१७)
ebook converter DEMO Watermarks*