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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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तेरहवां कांड
सूक्त-१ देवता—अध्यात्म आदि
उदेहि वाजिन् यो अप्स्व १ न्तरिदं राष्ट्रं प्र विश सूनृतावत्.
यो रोहितो विश्वमिदं जजान स त्वा राष्ट्राय सुभृतं बिभर्तु.. (१)
हे सूर्य! तुम अंतरिक्ष में क्यों छिपे हो, तुम उदय प्राप्त करो. तुम सत्य और प्रिय वाणी से
युक्त हो कर यहां आओ. इस प्रकार के सूर्य देव ने संसार का प्रकाशन किया. सूर्य देव तुम्हें
राष्ट्र के भरणकर्ता के रूप में पुष्ट करे. (१)
उद्वाज आ गन् यो अप्स्व १ न्तर्विश आ रोह त्वद्योनयो या:.
सोमं दधानो ऽ प ओषधीर्गाश्चतुष्पदो द्विपद आ वेशयेह.. (२)
हे सूर्य! जल में रहने वाली जो प्रजाएं तथा जलप्रद अन्न हैं, वे तुम्हारे पास आएं. तुम
जल पर चढ़ो और सोम को धारण करते हुए जल, ओषधि तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और
चार पैरों वाले पशुओं को इस राष्ट्र में प्रविष्ट करो. (२)
यूयमुग्रा मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजा प्र मृणीत शत्रून्.
आ वो रोहितः शृणवत् सुदानवस्त्रिषप्तासो मरुतः स्वादुसंमुदः.. (३)
हे मरुद्गण! तुम इंद्र के सखा हो. तुम शत्रुओं का नाश करो. तुम स्वादिष्ट पदार्थों से
प्रसन्न होने वाले हो और सुंदर वर्षा प्रदान करते हो. सूर्य तुम्हारी बात सुनें. (३)
रुहो रुरोह रोहित आ रुरोह गर्भो जनीनां जनुषामुपस्थम्.
ताभिः संरब्धमन्वविन्दन् षडुर्वीर्गातुं प्रपश्यन्निह राष्ट्रमाहाः.. (४)
सूर्य उदय होते हुए आकाश पर चढ़ रहे हैं. छह उर्वियों की प्राप्ति के हेतु वे राष्ट्र को
नित्यप्रति देखते हुए उर्वियों को प्राप्त करते हैं. (४)
आ ते राष्ट्रमिह रोहितोऽहार्षीद् व्य स्थन्मृधो अभयं ते अभूत्.
तस्मै ते द्यावापृथिवी रेवतीभिः कामं दुहातामिह शक्वरीभिः.. (५)
हे यजमान! तेरे राष्ट्र पर सूर्य आ गए हैं, इसलिए तू युद्ध का भय मत कर. आकाश,
पृथ्वी और धन देने वाली ऋचाएं तेरे लिए कामनाओं का दोहन करें. (५)
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