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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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वशा गाय के सामने आने वाले ब्राह्मण अपने ही धन के समान उस के पास जाते हैं.
इन्हें वर्जित करना अर्थात् इन्हें रोकना गाय के स्वामी को हानि पहुंचाता है. (१५)
चरेदेवा त्रैहायणादविज्ञातगदा सती.
वशां च विद्यान्नारद ब्राह्मणास्तर्ह्येष्याः.. (१६)
हे नारद! यह धेनु अविजात गद अर्थात् रोग को न जानती हुई तीन वर्ष तक विचरण
करे अथवा घास आदि खाए. यजमान इस के बाद इस धेनु को वशा मानता हुआ ब्राह्मणों की
खोज करे. (१६)
य एनामवशामाह देवानां निहितं निधिम्.
उभौ तस्मै भवाशर्वौ परिक्रम्येषुमस्यतः.. (१७)
यह वशा इन देवताओं की धरोहर के रूप में है. इस वशा को जो मनुष्य अवशा कहता
है वह भव और शर्व के बाणों का लक्ष्य बनता है. (१७)
यो अस्या ऊधो न वेदाथो अस्या स्तनानुत.
उभयेनैवास्मै दुहे दातुं चेदशकद् वशाम्.. (१८)
जो मनुष्य इस वशा के थनों और ऊधस अर्थात् ऐन को जानता हुआ इस का दान
करता है, यह वशा उसे अपने थनों और उन दोनों के द्वारा फल देने वाली होती है. (१८)
दुरदभ्नैनामा शये याचितां च न दित्सति.
नास्मै कामाः समृध्यन्ते सामदत्त्वा चिकीर्षति.. (१९)
जो मांगने पर उस वशा का दान नहीं करता है, उस को दुर्द्म्न अर्थात् वश में न आने
वाली दशा जकड़ लेती है. जो उसे अपने पास ही रखना चाहता है, उस की इच्छाएं पूर्ण नहीं
होतीं. (१९)
देवा वशामयाचन् मुखं कृत्वा ब्राह्मणम्.
तेषां सर्वेषामददद्धेडं न्येति मानुषः.. (२०)
ब्राह्मण को अपना मुख बना कर देवता वशा को मांगते हैं. इसे न देने वाला मनुष्य उन
के क्रोध का लक्ष्य बनता है. (२०)
हेडं पशूनां न्येति ब्राह्मणेभ्यो ऽ ददद् वशाम्.
देवानां निहितं भागं मर्त्यश्चेन्निप्रियायते.. (२१)
जो पुरुष देवताओं की धरोहर रूप भाग को अपना अत्यंत प्रिय समझता है, वह
ब्राह्मणों को वशा का दमन करने के कारण पशुओं का क्रोध प्राप्त करता है. (२१)
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