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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 651 of 1063

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Page 651

इमं क्रव्यादा विवेशायं क्रव्यादमन्वगात्.
व्याघ्रौ कृत्वा नानानं तं हरामि शिवापरम्.. (४३)
इस पुरुष ने क्रव्याद अग्नि का अपने घर में प्रवेश कर लिया है तथा यह उसी का
अनुगामी हो गया है. मैं उन दोनों को बाधक के समान मानता हूं तथा इस क्रव्याद अग्नि को
अलग करता हूं. (४३)
अन्तर्धिर्देवानां परिधिर्मनुष्याणामग्निार्हपत्य उभयानन्तरा श्रितः.. (४४)
देवताओं के भीतरी और मनुष्यों के परिधि रूप गार्हपत्य अग्नि देवताओं और मनुष्यों
के मध्यस्थ हैं. (४४)
जीवानामायुः प्र तिर त्वमग्ने पितॄणां लोकमपि गच्छन्तु ये मृताः.
सुगार्हपत्यो वितपन्नरातिमुषामुषां श्रेयसीं धेह्यस्मै.. (४५)
हे अग्नि! तुम जीवितों की आयु की वृद्धि करो तथा मृतकों को देवलोक में भेजो.
गार्हपत्य अग्नि शत्रुओं को जलाएं. हे गार्हपत्य अग्नि! तुम मंगलमयी उषा को हम में प्रतिष्ठित
करो. (४५)
सर्वानग्ने सहमानः सपत्नानैषामूर्जं रयिमस्मासु धेहि.. (४६)
हे अग्नि! तुम सब शत्रुओं को वश में करते हुए उन के बल और धन को हम में प्रतिष्ठित
करो. (४६)
इममिन्द्रं वह्निं पप्रिमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद् दुरितादवद्यात्.
तेनाप हत शरमापतन्तं तेन रुद्रस्य परि पातास्ताम्.. (४७)
इन ऐश्वर्य वाली अग्नि का स्तवन करो. ये तुम्हें पाप से मुक्त करें. उन के द्वारा तुम रुद्र
के बाण को दूर हटाते हुए अपनी रक्षा करो. (४७)
अनडुवाहं प्लवमन्वारभध्वं स वो निर्वक्षद् दुरितादवद्यात्.
आ रोहत सवितुर्नावमेतां षड्भिरुर्वीभिरमतिं तरेम.. (४८)
हवि रूप माता की वाहक अग्नि का स्तवन करो. वे पाप से तुम्हारी रक्षा करें. अग्नि
सविता की नौका पर चढ़ कर छह देवियों के द्वारा हमें बुद्धि से बचाएंगे. (४८)
अहोरात्रे अन्वेषि बिभ्रत क्षेम्यस्तिष्ठन् प्रतरणः सुवीरः.
अनातुरान्तसुमनसस्तल्प बिभ्रज्जयोगेव नः पुरुषगन्धिरेधि.. (४९)
हे गार्हपत्य अग्नि! तुम दिन और रात के आश्रय रूप होते हुए हमें प्राप्त हो. तुम
कल्याणप्रद होते हुए हमें पुत्र, पौत्रादि से युक्त करते हो. तुम्हारी आराधना सुगम है. तुम हमें
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