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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 557 of 1063

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Page 557

अग्निं यश्चक्र आस्यं १ तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३३)
सूर्य एवं बारबार नवीन होने वाला चंद्रमा जिस के नेत्र हैं तथा अग्नि को जिस ने अपना मुख बनाया है, उस श्रेष्ठ ब्रह्म के लिए मेरा नमस्कार है. (३३)
यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरङ्गिरसो ऽ भवन्.
दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३४)
वायु जिस के प्राण और अपान तथा अंगिरस जिस के नेत्र बने थे तथा दिशाओं को जिस ने अपनी प्रज्ञा का साधन बनाया था, उस ज्येष्ठ के लिए मेरा नमस्कार है. (३४)
स्कम्भो दाधार द्यावापृथिवी उभे इमे स्कम्भो दाधारोर्व१न्तरिक्षम्.
स्कम्भो दाधार प्रदिशः षडुर्वीः स्कम्भ इदं विश्वं भुवनमा विवेश.. (३५)
परमात्मा ने स्वर्ग और पृथिवी दोनों को धारण किया है. उसी ने अंतरिक्ष अर्थात् आकाश को धारण किया है. उसी परमात्मा ने छः विशाल दिशाओं —अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर और नीचे की दिशाओं को धारण किया है. वही परमात्मा इस सारे संसार में समाया हुआ है. (३५)
यः श्रमात् तपसो जातो लोकान्तसर्वान्‍त्समानशे.
सोमं यश्चक्रे केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३६)
जो तपस्या रूपी श्रम से उत्पन्न हो कर समस्त लोकों में व्याप्त रहता है तथा जिस ने एक मात्र सोमलता को ही उत्तम जड़ी बनाया है, उस श्रेष्ठ परमात्मा के लिए मेरा नमस्कार है. (३६)
कथं वातो नेलयति कथं न रमते मनः.
किमापः सत्यं प्रेप्सन्तीर्नेलयन्ति कदा चन.. (३७)
वायु स्थिर क्यों नहीं रहती तथा मन शांत क्यों नहीं रहता? सत्य की अभिलाषा करते हुए जल कभी अस्थिर क्यों नहीं होते? (३७)
महत् यक्षं भुवनस्य मध्ये तपसि क्रान्तं सलिलस्य पृष्ठे.
तस्मिञ्छ्रयन्ते य उ के च देवा वृक्षस्य स्कन्धः परित इव शाखाः.. (३८)
संसार के मध्य महान यक्ष, अर्थात् परमात्मा है. संताप अर्थात् गरमी देने वाला वह परमात्मा जल के ऊपर वर्तमान है. ऐसा सुना जाता है कि सभी देव उस में इस प्रकार व्याप्त हैं, जिस प्रकार वृक्ष की शाखाएं उस में व्याप्त रहती हैं. (३८)
यस्मै हस्ताभ्यां पादाभ्यां वाचा श्रोत्रेण चक्षुषा.
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