Skip to content
SarvaKosh
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 555 of 1063

Read in context
Page 555

जिस से ऋचाएं बनीं एवं जिस से यजुर्वेद के मंत्र बने, सामवेद के मंत्र जिस के रोम एवं
अथर्ववेद के मंत्र जिस का मुख है, उस परमेश्वर के विषय में बताओ कि वह कौन है? (२०)
असच्छाखां प्रतिष्ठन्तीं परममिव जना विदुः.
उतो सन्मन्यन्ते ऽ वरे ये ते शाखामुपासते.. (२१)
असत् अर्थात् निराकार से उत्पन्न हुई शाखा स्थित है. मनुष्य उसी को सब से श्रेष्ठ तत्त्व
मानते हैं तथा उस शाखा की उपासना करते हैं. (२१)
यत्रादित्याश्च रुद्राश्च वसवश्च समाहिताः.
भूतं च यत्र भव्यं च सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव
सः.. (२२)
जिस में बारह आदित्य, एकादश रुद्र और आठ वसु समाए हुए हैं, उस परमेश्वर के
विषय में बताओ कि वह कौन है. (२२)
यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा निधिं रक्षन्ति सर्वदा.
निधिं तमद्य को वेद यं देवा अभिरक्षथ.. (२३)
तैंतीस देवता सदा जिस की निधि अर्थात् खजाने की रक्षा करते हैं, हे देवो! जिस की
निधि की तुम रक्षा करते हो, आज उसे कौन जानता है? (२३)
यत्र देवा ब्रह्मविदो ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते.
यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स ब्रह्मा वेदिता स्यात्.. (२४)
उस ब्रह्म को जानने वाले देव ज्येष्ठ ब्रह्म की उपासना करते हैं, जो उस ब्रह्म को निश्चित
रूप से जानता है, वह ब्रह्म हो सकता है. (२४)
बृहन्तो नाम ते देवा ये ऽ सतः परि जज्ञिरे.
एकं तदङ्गं स्कम्भस्यासदाहुः परो जनाः.. (२५)
वे बृहत् नाम के देव हैं, जो असत् अर्थात् प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं. लोक उन्हें श्रेष्ठ कहता
है. (२५)
यत्र स्कम्भः प्रजनयन् पुराणं व्यवर्तयत्.
एकं तदङ्गं स्कम्भस्य पुराणमनुसंविदुः.. (२६)
जहां परमात्मा पुराण पुरुष को उत्पन्न करता हुआ विस्तृत करता है, उस परमात्मा के
एक अंग को ज्ञानी जन पुराण के नाम से ही जानते हैं. (२६)
यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे.
ebook converter DEMO Watermarks*