अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए
अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य
आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें. (२)
यदुवक्थानृतं जिह्वया वृजिनं बहु.
राज्ञस्तवा सत्यधर्मणो मुञ्चामि वरुणादहम्.. (३)
हे जलोदर रोग से ग्रसित पुरुष! अपनी जिह्वा से तूने पाप का साधन असत्य भाषण
अधिक किया है. मैं सत्य धर्म वाले एवं तेजस्वी वरुण के कोप से तेरी रक्षा करता हूं. (३)
मुञ्चामि त्वा वैश्वानरादर्णवान् महतस्परि.
सजातानुग्रहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि न:.. (४)
हे पुरुष! मैं तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम
शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार
आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से
प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए. (४)
सूक्त-११ देवता—पूषा आदि
वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधा:.
सिस्रतां नार्यृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ.. (१)
हे पूषा देव! सुख उत्पन्न करने वाले इस यज्ञ कर्म में प्राणि समूह के प्रेरक देव अर्यमा
होता बन कर आप को हवि प्रदान करें. संपूर्ण जगत् के निर्माता वेधा देव आप को वषट्कार
के द्वारा हवि प्रदान करें. आप की कृपा से यह गर्भिणी नारी प्रसव संबंधी कष्ट से छुटकारा पा
कर जीवित संतान को जन्म दे. सुखपूर्वक प्रसव के लिए इस के संधि बंध शिथिल हो जाएं.
(१)
चतस्रो दिवः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत.
देवा गर्भं समैरयन् तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे.. (२)
द्युलोक से संबंधित प्राची आदि चार दिशाओं एवं भूलोक की आग्नेयी आदि चार
दिशाओं ने एवं इन दिशाओं के अधिष्ठाता इंद्र आदि देवों ने पहले गर्भ को पूर्ण किया था. वे
सभी देव इस समय गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें.
(२)
सूषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि.
श्रथया सूषणे त्वमव त्वं बिष्कले सृज.. (३)
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