अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदेवों ने गाय के रथंतर रूपी थन से जड़ीबूटियों को और बृहत सामरूपी थन से व्यच को
दुहा. (७)
अपो वामदेव्येन यज्ञं यज्ञायज्ञियेन.. (८)
देवों ने वामदेव्य सामरूपी थन से जल का और यज्ञिय रूपी थन से यज्ञ का दोहन
किया. (८)
ओषधीरेवास्मै रथंतरं दुहे व्यचो बृहत्.. (९)
इस बात को जो जानता है, उस के लिए रथंतर साम जड़ीबूटियां और बृहत् साम
अर्थात् व्याप्त आकाश प्रदान करते हैं. (९)
अपो वामदेव्यं यज्ञं यज्ञायज्ञियं य एवं वेद.. (१०)
इस बात को जानने वाले के लिए वामदेव्य साम जल और यज्ञायज्ञिय साम यज्ञ प्रदान
करते हैं. (१०)
सूक्त-१० (३) देवता—विराट्
सोदक्रामत् सा वनस्पतीनागच्छत् तां वनस्पतयो ऽ घ्नत सा संवत्सरे
संभवत्.. (१)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह वनस्पतियों के समीप पहुंचा. वनस्पतियों ने उस
का हनन किया तो वह संवत्सर बन गया. (१)
तस्माद् वनस्पतीनां संवत्सरे वृक्णमपि रोहति.
वृश्चते ऽ स्याप्रियो भ्रातृव्यो य एवं वेद.. (२)
इसी कारण वनस्पतियों का कटा हुआ भाग संवत्सर अर्थात् एक वर्ष में उत्पन्न हो जाता
है. जो इस बात को जानता है, उस का शत्रु नाश को प्राप्त होता है. (२)
सोदक्रामत् सा पितॄनागच्छत् तां पितरोऽघ्नत सा मासि संभवत्.. (३)
उस विराट् ने उत्क्रमण किया और वह पितरों के समीप पहुंचा. पितरों ने उस का हनन
किया तो वह विराट् मास बन गया. (३)
तस्मात् पितृभ्यो मास्युपमास्यं ददति प्र पितृयाणं पन्थां जानाति य एवं
वेद.. (४)
इसीलिए प्रतिमास पितरों की उपासना कर के उन्हें भोजन दिया जाता है. जो इस बात
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