अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपहला कांड
सूक्त-१ देवता—वाचस्पति
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः.
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे.. (१)
जो रजोगुण, तमोगुण एवं सतोगुण तीन गुण और पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश,
तन्मात्रा एवं अहंकार सात पदार्थ दिव्य रूप में सर्वत्र भ्रमण करते हैं, वाणी के स्वामी ब्रह्म उन
तत्त्वों और पदार्थों की दिव्य शक्ति मुझे दें. (१)
पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह.
वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम्.. (२)
हे वाणी के स्वामी ब्रह्म देव! आप दिव्य मन के साथ मेरे समीप आइए. हे प्राण के
स्वामी ब्रह्म! इच्छित फल दे कर मुझे आनंदित कीजिए. मेरे द्वारा अध्ययन किए गए वेदशास्त्र
धारण करने की मुझे बुद्धि दीजिए. (२)
इहैवाभि वि तनूभे आर्त्नी इव ज्यया.
वाचस्पतिर्नि यच्छतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम्. (३)
हे वाणी के स्वामी ब्रह्म! जिस प्रकार धनुष की डोरी चढ़ाने से उस के दोनों सिरे समान
रूप से खिंच जाते हैं, उसी प्रकार मुझे वेदशास्त्र धारण करने की शक्ति एवं आनंदोपभोग के
इच्छित साधन प्रदान करो. (३)
उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिर्ह्वयताम्.
सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि.. (४)
वाणी के स्वामी ब्रह्म का हम आह्वान करते हैं. हमारे द्वारा आह्वान किए गए ब्रह्म हमें
अपने समीप बुलाएं. हम संपूर्ण ज्ञान से सदैव युक्त रहें तथा कभी दूर न हों. (४)
सूक्त-२ देवता—पर्जन्य
विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं भूरिधायसम्.
विद्मो ष्वस्य मातरं पृथिवीं भूरिवर्पसम्.. (१)
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