अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextआ रभस्वेमाममृतस्य श्रुष्टिंमच्छिद्यमाना जरदष्टिरस्तु ते.
असुं ते आयुः पुनरा भरामि रजस्तमो मोप गा मा प्र मेष्ठाः.. (१)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम हमारे द्वारा किए जाते हुए अमरण संबंधी
अनुष्ठान को अनुभव करो. तुम्हारा शरीर शत्रुओं के द्वारा छिन्नभिन्न न होने वाला तथा
वृद्धावस्था को प्राप्त करने वाला हो. इस के लिए मृत्यु से छीने गए तेरे प्राणों को मैं पुनः आयु
से भरता हूं. तू सत्व गुण के प्रतिबंधक रजोगुण और तमोगुण को प्राप्त न हो. तू हिंसा को भी
प्राप्त न हो. (१)
जीवतां ज्योतिरभ्येह्यर्वाङा त्वा हरामि शतशारदाय.
अवमुञ्चन् मृत्युपाशानशस्तिं द्राघीय आयुः प्रतरं ते दधामि.. (२)
हे पुरुष! तू मनुष्यों की ज्ञान दीप्ति प्राप्त कर के हमारे सामने आ. हम तुझे सौ संवत
तक जीने के लिए मृत्यु से छीन लाए हैं. मृत्यु के ज्वर, सिरदर्द आदि पाशों से हम ने तुझे
छुड़ाया है. हम तुझे निंदा से मुक्त करते हुए सौ वर्ष की दीर्घ आयु में अत्यधिक रूप से
स्थापित करते हैं. (२)
वातात् ते प्राणमविदं सूर्याच्चक्षुरहं तव.
यत् ते मनस्त्वयि तद् धारयामि सं वित्स्वाङ्गैर्वद जिह्वयालपन्.. (३)
हे प्राणरहित पुरुष! मैं ने तुम्हारे प्राणों को वायु से प्राप्त किया है. मैं ने तुम्हारे चक्षु को
सूर्य से प्राप्त किया है तथा मैं तुम्हारे मन को तुम्हीं में धारण करता हूं. इस प्रकार तुम सभी
अंगों से युक्त हो कर एवं जीभ से बोलते हुए व्यक्त उच्चारण करो. (३)
प्राणेन त्वा द्विपदां चतुष्पदामग्निमिव जातमभि सं धमामि.
नमस्ते मृत्यो चक्षुषे नमः प्राणाय ते ऽ करम्.. (४)
हे प्राणहीन पुरुष! मैं दो पैरों वाले अर्थात् स्त्रीपुरुषों और चार पैरों वाले अर्थात् गाय,
घोड़े आदि पशुओं के प्राणों से तुझे इस प्रकार संयुक्त करता हूं, जिस प्रकार अरणि मंथन से
अग्नि उत्पन्न होती है. हे मृत्यु! मैं ने तेरे क्रूर नेत्र के लिए नमस्कार किया है तथा तेरे अत्यधिक
बल के लिए भी मैं नमस्कार करता हूं. (४)
अयं जीवतु मा मृतेमं समीरयामसि.
कृणोम्यस्मै भेषजं मृत्यो मा पुरुषं वधीः.. (५)
यह प्राणहीन पुरुष जीवित रहे. यह मरण को प्राप्त न हो. हम इसे चेष्टा करने के लिए
प्रेरित करते हैं. हम इस मरने वाले पुरुष की चिकित्सा करते हैं. हे मृत्यु! तू इस का वध मत
कर. (५)
जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्.
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